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Thursday, 3 May 2012

बीते लम्हे

वो दोस्तों से झगड़ना,बात न करना और फिर खुद ही मान जाना.भरी महफ़िल में एक दूसरे की जम कर खिचाई करना और को खुद उनसे बेहतर साबित करने की जी तोड़ कोशिश में जुट जाना.वो ऑटो रिक्शा में हम 
चारो का एक ही सीट पर ठूस ठूस कर बैठ जाना और मस्ती करते हुए हस्ते हस्ते लोट पोट हो जाना.यूँ ही बातों बातों में पलक झपकते ही रास्तों का कट जाना.वो लंच टाइम में एक दुसरे से छीन झपट  कर खाना,फिर भी पेट न भरे टीचर्स की टिफ़िन पर डाका डालना.वो लेक्चर के बीच मिस कॉल कर-कर के दूसरों का ध्यान भटकाना और नोट्स मांगने पर बातों-बातों में टरकाना.वो टीचर्स का हमें डांटना और प्यार से समझाना, क्लास में उलटी सीधी हरकतों से उनको सताना.फिर भी डांट न पड़े तो सवाल पूछ पूछ कर उनका दिमाग खा जाना.वो एक दुसरे 
की शिकायत कर डांट खिलवाना और जब खुद की बारी आए तो मैदान-ए-जंग में उतर जाना.
क्या दिन था वो यूनिवर्सिटी का  सुहाना, जहाँ हर रोज़ बनता था एक नया अफसाना .
हाथ से भुरभुरी रेत की तरह जाने कब फिसल गए ये दो साल हमारे.वो 
लम्हे वो यादें हमेशा महफूज़ रहेंगे दिल में हमारे.........


यादों के पन्नो को हमने जब भी पलट कर देखा ...!
दोस्तों के साथ कभी झगड़ते कभी खुद को हसते देखा ....!