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Monday, 20 October 2014

आतंकवाद और मुसलमान


हिंसा और आतंकवाद का नाता दशकों से मुस्लिम समुदाय से जोड़ा जाता रहा है। हिंसा मानव जीवन को कैसे प्रभावित करती है? क्या मानवता या इस्लाम किसी भी स्थिति में आतंकवाद व हिंसा की अनुमति देता है? ऐसे बहुत से प्रश्न है जो हम सभी के मन में कुलबुलाते रहते हैं।
हिंसा एक अनैतिक प्रवृत्ति है। एक सभ्य समाज में इसकी कोई जगह नहीं है और ऐसा करने वालों के लिए सख्त सज़ा का प्रावधान है। केवल आत्म रक्षा के लिए हम हिंसा का सहारा ले सकते हैं। दूसरी ऐसी परिस्थिति में अपराधियों को सज़ा देना, जिससे कि वह दोबारा ऐसे जघन्य अपराध करने का दुस्साहस न कर सकें। उपर्युक्त ऐसी दो स्थितियाँ हैं जिसमें इस्लाम भी हिंसा की अनुमति देता है। इसमें इस बात का कड़ा निर्देश दिया गया है कि ऐसी दो स्थितियाँ वास्तव में सिद्ध हो अन्यथा किसी भी दशा में हिंसा करने वाला व्यक्ति बड़ा अपराधी होगा। इन्हीं बातों को मुद्दा बना कर आज वैश्विक स्तर पर  अमरीकन व ब्रिटिश सरकार और भारत में हिन्दुत्व विचार-धारा के लोगों द्वारा प्रायः हर मुसलमान को आतंकवादी कहने का चलन सा हो गया है। वास्तविकता यह है कि इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो प्रेम, निष्ठा, भाईचारे, करूणा, सौहार्द, क्षमाशीलता से परिपूर्ण है परन्तु दुर्भाग्य यह है कि मुसलमानों ने कभी भी अपने धर्म व उससे जुड़ी अच्छाईयों को न अपनाया और न ही संसार के समक्ष प्रस्तुत किया। इसके कई कारण है जिस ओर हम सभी को एक बार अपनी दृष्टि अवश्य करनी चाहिए।
भारतीय जनतंत्र की बात करे तो यहाँ मुस्लिम, सिख, इसाई अल्प-संख्यक के रूप में जाने जाते है। लोकतंात्रिक शासन के उपरांत इन अल्पसंख्यकों को सरकार का उतना समर्थन नहीं मिलता जितना कि बहुसंख्यकों को प्राप्त है। हमारे देश की नीति-रीति मे मानव अधिकार आयोग द्वारा विभिन्न कमियों का उल्लेख किया गया है। धार्मिक-विभिन्नता के कारण भारत मे सर्वाधिक सम्प्रादायिक दंगों के चलते समय-समय पर विभिन्न आयोगों ने कुछ तथ्य प्रस्तुत किए। वह यह कि ऐसी स्थिति में यहाँ का अल्पसंख्यक स्वयं को सबसे अधिक असुरक्षित व भयभीत महसूस करता है। उनके भीतर यह भावना पनपती रहती है कि ये बड़ी संख्या के लोग छाटे समुदाय की तितर-बितर संख्या को निगल जाएगें। उनकी यह अवधारणा इस बात से भी विकसित होती है कि हिन्दू बाहुल समाज या अन्य राष्ट्रों में जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक के रूप मे रह रहे है वहाँ सरकार की तरफ से इनकी समृद्धि व सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है, जो कि निश्चित रूप से होना चाहिए।
इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि देश का मुसलमान वर्ग अशिक्षा, गरीबी और पिछड़ेपन की मार झेल रहा हे। गाहे-ब-गाहे उसे भेद-भाव, परित्याग व ऐसी विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है जिसमें मे क्रोध, निराशा, असहिष्णुता एवं आक्रमक प्रवृत्ति का उत्पन्न होना स्वाभाविक बात है। उन्हे अपने शासक मसीहा नहीं दुश्मन लगने लगते हैं। इसी बात का लाभ कुछ सक्रिय आक्रमक व अवांछनीय गुट उठाते हैं। वे ऐसे निराश व शासन से हताश लोगों को बहका कर अपने गुट में शामिल कर लेते हैं और यह प्रतिशोध आतंक व हिंसा के रूप में सामने आता है जिसका शिकार देश की मासूम व निर्दोष जनता होती है । यह भी देखा गया है कि छोटे-छोटे विवाद को लोग धर्म से जोड़ कर साम्प्रादायिक तनाव फैलाते हैं और यह धार्मिकता की छोटी सी चिंगारी जंगल की आग की भाँति एक प्रांत से दूसरे प्राँत में फैल कर धार्मिक उन्माद पैदा करती है।
निःसंदेह किसी भी देश के अल्पसंख्यक समुदाय को भी अपनी जान, माल और प्रतिष्ठा की रक्षा करने का पूर्ण अधिकार है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही विशिष्टता है कि अपनी जान का खतरा महसूस होने पर हम अपना बचाव कर सकते हैं, चाहे इससे आक्रमणकारी की जान ही क्यो न चली जाए परन्तु वर्तमान स्थिति के दबाव में आ कर कुछ लोग ऐसा कदम उठा लेते हैं जो न उनके स्वंय के लिए हितकर होता है और न औरों के लिए। इसकी अनुमति हमारा कानून नहीं देता। जैसे कि-
(1) हिंसा को रोकने के लिए हिंसात्मक हमला करने से पहले ही हमलावार पर वार करना।
(2) किसी समुदाय से बदला लेने के लिए उसी समुदाय के निर्दोष लोगों की हत्या करना।
(3) शासन और प्रशासन की कार्य-प्रणाली से असन्तुष्ट हो कर आम जनता को अपने गुस्से का शिकार बनाना।
उपरोक्त बातों की अनुमति न इस्लाम देता है, न कानून और न ही हमारी अपनी सूझ-बूझ।
इस समस्या पर सोच-विचार करने से पूर्व हमे इस ओर ध्यान देना चाहिए कि अल्पसंख्यक मुस्लिम वर्ग को ऐसी स्थितियों का सामना क्यों करना पड़ता है ? इसके कुछ ऐतिहासिक कारण है। हिन्दू-मुस्लिम की वर्तमान पीढ़ी को भूतपूर्व घटनाओं से कोई लेना-देना नहीं है। वे ऐसे मुद्दों को अनदेखी करते हैं जिससे साम्प्रादायिक खिचाँव पैदा हो और देश का भविष्य व आने वाली पीढ़ी पर संकट आने का संदेह हो। समाज के विद्वान, शिक्षित व समझदार लोग इस भावना को लोगों तक पहुँचाने का भरसक प्रयास करते हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म से नहीं वरन् कर्म से पहचानना चाहिए और मिलजुल कर देश को प्रगति की ओर ले जाना चाहिए। पर इसी समाज के कुछ अराजक/असमाजिक तत्व  नफरत और हिंसा फैलाते है, जिनकी संख्या मुठ्ठी भर है परन्तु इन पर नियंत्रण करना असम्भव होता जा रहा है। देश मे राजनीतिक दृष्टिकोण, वैधानिक ढ़ाँचा एवं कार्यपालिका की कार्यवाही में कमियों के चलते भी इन्हें हवा मिल रही है। जनतंात्रिक व्यवस्था की ऐसी डाँवाडोल स्थिति का कुछ भ्रष्ट लोग पूरा लाभ उठाते है ताकि वे अधिक से अधिक वोट और सत्ता प्राप्त कर सकें।
यदि ऐसे असमाजिक गुटों व समुदायों से देश को बचाना है और अमन-चैन लाना है तो मुसलमानों को राजनीति मे आगे आना होगा। किसी राजनीतिक पार्टी मे इक्का-दुक्का उम्मीदवार खड़ा करने से कुछ नहीं हांेगा। उन्हें प्रतिष्ठित संस्थानों मे भी अपनी उपस्तिथि दर्ज करानी होगी। इसमें मीडिया की भूमिका सर्वोपरि है। अब तक इस क्षेत्र में भी मुसलमानों की कोई खास भूमिका नहीं रही है। इस अन्तर को जल्द से जल्द मिटाना होगा। केवल अंग्रेज़ी व हिन्दी माध्यम से ही नहीं बल्कि विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के द्वारा  भी मुसलमानों को अपनी घृणित व दकियानूसी छवि को साफ कर दुनिया के समक्ष अपनी सही तस्वीर प्रस्तुत करनी होगी। इस्लाम में नफरत, घृणा व हिंसा का कोई स्थान नहीं है। इसे मुसलमानों को ही सबके सामने लाना होगा, कोइ दूसरा इसे नहीं कर सकता। केवल अखबारों व पत्रिकाओं मे छोटे-मोटे लेख छापने से कुछ नहीं होने वाला है। आज की माँग व रूझान को देखते हुए क्षेत्रीय, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर टेलीवीज़न व इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी सहारा लेना होगा। इसके द्वारा सर्वत्र फैली नफरत की दीवार को गिराना होगा।
एक ही देश मे रहते हुए हिन्दू और मुस्लिम, धर्म को हव्वा बनाकर अलग-अलग जीवन यापन करते हैं। वे एक दूसरे के सुख-दुख से अनभिज्ञ होते हैं और उसमे सहयोग करने का मौका भी शायद ही कभी प्राप्त होता है। जब तक हम एक-दूसरे के साथ मिल-जुल कर रहना नहीं सीखेगें त ब तक कोई न कोई नफरत पैदा करने वाला हमारे बीच दरार डालता रहेगा और अपने नापाक इरादों मे कामयाब होता रहेगा। वर्तमान स्थिति यह माँग करती है कि हमें ऐसे नकारात्मक तत्वों को सिरे से नकाराना होगा और मुसलमानों को हर क्षेत्र मे भागीदारी दे कर अपने समुदाय की गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ेपन को मिटाना होगा। यदि  मुसलमानों ने यह कर दिखाया तो वे अपनी व देश की सबसे बड़ी कमज़ोरी को सिरे से समाप्त कर पायेगें।