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Tuesday, 25 March 2014

पुरषों की तुलना में महिलाएँ अधिक ईर्ष्यालु



आज महिलाएँ जिस गति से विभिन्न क्षेत्रों मे अपना लोहा मनवा रही हैं, उससे ऐसा मालूम हो रहा है कि आने वाले दिनो मे इनका ही परचम लहराएगा। आज कोई भी क्षेत्र ऐसा नही जहाँ महिलाओं की भागीदारी न हो। विभिन्न संस्थानो मे महिलाओं की संख्या मे वृद्धि के साथ ही साथ महिलाओं मे अपनी महिला सहकर्मी के प्रति इष्र्या एवं द्वेष की भावना भी तेज़ी से विकसित हो रही है। यह सत्य ही प्रतीत होता है कि ‘‘मोहे न नारि-नारि के रूपा’’ (रा0 च0 मानस) ।

सदियो से चले आ रहे दादी-नानी के अनुभवों और आए दिन हो रहे मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर यह साबित हो चुका है कि पुरूषों की तुलना मे महिलाओं के अन्दर दूसरी महिला के प्रति जलन की भावना अत्यधिक होती है। घर के भीतर सास-बहू-नन्द के रूप मे और अब कार्यस्थल पर प्रतिद्वन्द्वी के रूप मे। यह स्थिति देखी जा रही है कि उनके कार्यक्षेत्र अलग-अलग ही क्यों न हो परन्तु वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने का अवसर खोजती रहतीं हैं। यदि वे सामने वाली महिला को स्वयं से अधिक निपुण, कार्यकुशल और सुन्दर देखती हैं तो उनके भीतर की उदारता, सहनशीलता, ममत्व जो नारी का सहज स्वाभाव है कहीं विलुप्त हो जाता है। कार्यस्थल पर अपनी महिला सहकर्मी का मज़ाक उड़ाना, दूसरों के सामने अपनामित करना, हतोत्साहित करना, बाॅस के समक्ष उनकी शिकायत एवं निन्दा करने मे इन्हें आनन्द मिलता है। उनसे यह सहन नही होता कि सामने वाली महिला कैसे उनसे अधिक वेतन पाने मे सक्षम है? कैसे वह किसी कठिन कार्य को सरलता एवं निपुणता से अन्जाम देती है? कैसे वह लोगो के बीच सुचर्चित हैं और एक सम्मानजनक जगह बना चुकी है? कैसे वह उससे अधिक सुन्दर दिखती है इत्यादि? इस प्रकार के प्रश्न निरन्तर उनके मन-मस्तिष्क मे घूमते रहते है, जिसका कोई उत्तर न मिलने की दशा मे वह अपने सहकर्मी के प्रति उपेक्षा की भावना रखने लगती है और उसका काम बिगाड़ने के नए-नए उपाय खोजती रहती है।

वहीं दूसरी ओर यह देखा गया है कि पुरूष कर्मचारी एक-दूसरे के प्रति दोस्ताना व्यवहार रखते है। अपने सहकर्मी की मदद करना और विषम परिस्थितियों मे साथ खड़े होना अपना परम कर्तव्य समझते है। वे एक-दूसरे के प्रति आदर व सम्मान की भावना रखते है और अपने सहकर्मी को प्रतिद्वन्द्वी न समझ कर दोस्त और भाई समझते है।

इसके पीछे एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक सोच काम करती है। दो लोगो के बीच ईष्र्या और द्वेष का सबसे बड़ा कारण है ‘डर’। एक महिला के भीतर इस बात का डर पनपता रहता है कि कहीं सामने वाले ने मेरा स्थान हड़प लिया तो ?? यदि उसके आने से कार्यालय में मेरी महत्वता कम हो गई तो ?? इस भावना के आगे उसकी बुद्धि काम करना बन्द कर देती है। उसके अन्दर यह असुरक्षा की भावना इतनी प्रबल हो जाती है कि उसकी आँखों के आगे नफरत का पर्दा चढ़ जाता है। कार्यस्थल से हट कर यदि सामान्य परिस्थिति की बात करे तो प्रायः यह देखा जाता है कि अगर कोई महिला अपने साथी के संग सुखी जीवन व्यतीत कर रही है तो उसकी सहेली या सम्बंधी का खून क्रोध और जलन की भावना से रगों में उबाल मारने लगता है। वह उसके सुखी जीवन की तुलना अपने जीवन से करने लगती है। उसे यह चिंता सताने लगती है कि मेरा जीवन उसके जैसा सुखद क्यों नहीं है?? आखिर उसमे ऐसा क्या है जो मुझमे नहीं ?? उसकी यह चिंता असुरक्षा और भय मे परिवर्तित हो जाती है तथा धीरे-धीरे नफरत का रूप धारण कर लेती है।

यदि आप के भीतर भी किसी दूसरी महिला को लेकर ऐसी भावना पनप रही है तो आपको यह समझने की आवश्यकता है कि इससे आप दूसरो का नहीं वरन् अपना नुकसान कर रही हैं। इस प्रकार का व्यवहार रखने से भले ही अपनी महिला सहकर्मी को नीचा दिखाकर कुछ क्षणों के लिए आत्मश्लाघा का अनुभव करें परन्तु इससे लोगों की दृष्टि मे आपकी नकारात्मक छवि बनेगी। भले ही लोग आपके सामने आपकी हाँ मे हाँ मिलाए परन्तु पीठ पीछे वे आपकी खिल्ली उड़ाते नज़र आऐंगे। कार्यालय मे हो रही गतिविधियों से सभी अवगत रहते है, कौन गलत है और कौन सही; इसका आभास उन्हें पूर्ण रूप से होता है। इसलिए ईष्र्यावश यदि आप किसी को गलत साबित करती हैं या बाॅस से कह कर उसे निष्कासित करा देती है तो इससे आप उसकी नही अपनी छवि धूमिल कर रही है। ऐसा करने से सभी की सहानभूति उसके साथ होगी और आवश्यकता पड़ने पर या कठिन परिस्थितियों मे कोई आप का साथ नही देगा।

इसका सबसे अच्छा विकल्प यह है कि आपको दूसरी महिला की गतिविधियों पर दृष्टि रखने के बजाए स्वयं के कार्यों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। खुद मे आत्म विश्वास पैदा करें और ऊपर वाले ने आप को जो दिया उससे सन्तुष्ट रहें। यदि आप वास्तव मे तरक्की करना चाहती हैं तो ईमानदारी से सकारात्मक प्रयास करते रहना चाहिए। भविष्य मे सफलता अवश्य मिलेगी।