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Thursday, 24 April 2014

अपने भीतर की चिंगारी को बुझने न दें




जैसे जैसे व्यक्ति अपनी बाल्यावस्था से युवावस्था मे पहुँचता है वैसे-वैसे प्राकृतिक तौर पर उसके व्यवहार मे परिवर्तन होते रहते है। बचपन मे जो वस्तु हमें लुभाती है, युवा होते-होते उनके प्रति हमारा आकर्षण कम होने लगता है और फिर एक समय ऐसा आता है जब वह बिल्कुल ही समाप्त हो जाता है। एक बच्चा अपने जन्म दिन की प्रतीक्षा एक माह पहले से ही करने लगता है, जैसे-जैसे एक-एक दिन घटता है वैसे-वैसे उसकी स्फूर्ति बढ़ती जाती है। वह हर छोटी-छोटी चीज़ मे अपनी खुशियाँ ढ़ूँढ़ लेता है। जैसे नए कपड़े, जूते, खिलौने देख कर उत्साहित हो जाना, परिवार जन के साथ सैर-सपाटे करना, पार्क मे झूले झूलना, कहानियाँ सुनना इत्यादि। इन बच्चों के भीतर एक आशा, एक उम्मीद की किरण या यूँ कहे एक चिंगारी होती है जो उनकी आँखों मे निरन्तर जगमगाती रहती है। पर जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे उसकी आँखों की यह जगमगाहट धुँधली पड़ जाती है। हममे से अकसर युवा इस उधेड़बुन मे लगे रहते हैं कि परीक्षा मे अच्छे नम्बर कैसे लाया जाए ? कैसे अच्छी नौकरी तलाशी जाए ? कैसे अधिक से अधिक पैसा कमाया जाए या फिर कैसे दूसरों की अपेक्षा अधिक सुन्दर और आकर्षक दिखा जाए ? इनमे से कुछ ऐसे भी हैं जो आज की जीवनशैली के अनुरूप एक नई समस्या मे उलझे रहते है कि कैसे अपने महिला या पुरूष दोस्त को अपनी ओर आकर्षित किया जाए ? जब उनकी यह इच्छा तमाम कोशिशों के बावजूद मूर्त रूप नहीं ले पाती तो यह निराशा कुण्ठा को जन्म देती है  और इसी गम को सीने से लगाए एकांत मे बैठ कर दुख भरे गीत सुनना प्रारम्भ कर देते है। उन्हें यह लगता है कि आगे का हमारा पूरा जीवन व्यर्थ हो गया। उनके भीतर की आशा, उनकी आँखों की जगमगाहट ऐसी ही तमाम उलझनों मे पड़ कर धुँधली पड़ जाती है।

वह व्यक्ति जिसके भीतर आशा और उम्मीद की किरण मद्धिम पड़ जाती या समाप्त हो जाती है वह व्यावहारिक रूप से उदास, उत्साहहीन, लक्ष्यहीन और निराश हो जाता है। उसके अन्दर जीने की या कुछ हासिल करने की इच्छा समाप्त हो जाती है। कुछ सालो पहले आई हिन्दी सिनेमा की हिट फिल्म ‘‘ जब वी मेट ’’ में मुख्य अभिनेत्री करीना कपूर का किरदार पहले भाग की तुलना मे दूसरे भाग मे कितना भिन्न था। यह तब होता है जब हमारे भीतर से वह चिंगारी समाप्त हो जाती है  और हम निराशावाद की ओर चले जाते है। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है कि हमे अपने भीतर की चिंगारी को बुझने नहीं देना चाहिए। जिस प्रकार दीपक को निरंतर जलने के लिए तेल की आवश्यकता होती है और साथ ही साथ हर प्रकार के आँधी-तूफान से उसकी रक्षा करनी होती है, उसी प्रकार हमे भी अपने अन्दर आशा के दीपक को जलाए रखने के लिए सतत् प्रयास की आवश्यकता पड़ती है।

भारत जैसे विकासशील देश मे अधिकतर लोगो को लगता है कि अधिक से अधिक पैसा कमाना और आलीशान घर मे ठाठ से रहना ही आत्म सुख का आधार है। यदि वास्तव मे ऐसा होता तो बड़े-बड़े अभिनेता जैसे शाहरूख खाँ और अमिताभ बच्चन फिल्मे बनाने के बजाए अपने आलीशान बंगले मे आराम कर रहे होते। बिरला और अम्बानी बाज़ार मे अपने नए उत्पाद उतारने के बदले अपनी सालो की कमाई अरबो-खरबों की जमाराशि से विश्व यात्रा पर निकल गए होते। तो वह आखिर क्या चीज़ है जो उन्हें निरनतर कार्य करने पर मजबूर करती है? वह है उनके भीतर जल रही चिंगारी, आशा, उम्मीद जो हर बार उन्हें पहले से बेहतर करने पर प्रोत्साहित करती है और जिसे करने से उन्हे सच्ची खुशी मिलती है। कोई एक छात्र परीक्षा मे कम नम्बर लाने के कारण सब छोड़ कर यह सोच कर बैठ जाए कि वह इससे अधिक नम्बर नहीं ला सकते या फिर क्रिकेट मे अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के कारण खिलाड़ी यह सोचने लगे कि वह जितनी भी मेहनत कर ले तेंदंुलकर नहीं बन सकता, पर यह सोच बिल्कुल निराधार एवं गलत है। कोई भी व्यक्ति एक-दो बार की मेहनत से आईन्सटीन, तेन्दुलकर और बच्चन नहीं बन सकता क्योंकि इन महान हस्तियों को भी हज़ारो बाधाओं और विफलताओं के पश्चात ही वह स्थान प्राप्त हुआ है। विफलताओं से घबराने बजाए हर बार एक नई उम्मीद के साथ खड़े होना चाहिए, आप एक बार के प्रयास से शिखर पर तो नहीं पहुँच पाएंगे पर हाँ पिछली बार से कहीं बेहतर प्रदर्शन करने मे खुद को सक्षम पाऐंगे। बस आवश्यकता है हमें अपनी पिछली गलतियों से सीख कर अगले पड़ाव तक पहुँचने की।

यहाँ यह भी उल्लेख करना चाहँूगी कि सफलता प्राप्ति के साथ-साथ हमें एक सन्तुलित जीवन की ओर उन्मुख होना चाहिए। सन्तुलित जीवन से आशय है अपने पारिवारिक सम्बंधो का मान रखना, अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना और मानसिक स्थिति को नियंत्रण मे रखना। यह प्रयास ही जीवन की सफलता के मूलमंत्र  हैं जिनकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते। पर इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं कि हमे अपने पूरे जीवन को रूखे-फीके अन्दाज़ मे, दूसरों की खुशी के लिए अपनी हर इच्छाओं का गला घोंट कर ,पूरा समय केवल काम मे झोंक देना चाहिए। हम एक इन्सान है, कम्प्युटर मे फिट किया गया कोई साॅफ्टवेयर नहीं जो चालू करते ही अपने फिट किए प्रोग्राम के अनुरूप चलता रहे। हमारा सौभाग्य रहा तो हम तकरीबन 65-70 साल जिऐंगे और इन 70 सालों मे केवल काम करने के बजाए थोड़ी मस्ती-मनोरन्जन कर लें तो क्या हर्ज है। कोई फर्क नहीं पड़ता यदि हम एक दिन काॅलेज छोड़ कर दोस्तों के साथ फिल्म देखने चले जाऐं, किसी होटल मे बैठ का काॅफी और ठण्डे का मज़ा लेते हुए हल्ला-गुल्ला करें, आज के युवाओं का रूझान को देखते हुए इश्क-विश्क कि चक्कर मे पड़े। यह सब इसलिए क्योंकि हम इन्सान है मशीन नहीं। अपने जीवन को गम्भीर न बनाऐं बल्कि अपने लक्ष्य की प्राप्ती के लिए पूरी गम्भीरता और ईमानदारी से प्रयत्न करें और हर प्रकार की भावनाओं से खुद को जोड़े रखे, जो कि एक व्यक्ति की पहचान है।

यहाँ जिस आशा और उम्मीद का वर्णन किया जा रहा है, उनमें कुछ बाधाऐं भी आती हैं जो हमे नकारात्मक दिशा की ओर उन्मुख करती और आगे बढ़ने से रोकती हैं। ये बाधाऐं हैं-निराशा, विफलता, पक्षपात और एकंातवास। किसी कार्य को पूर्ण करने के पश्चात यदि हमे अनुकूल परिणाम नहीं मिलता तो हम निराश हो जाते हैं। अपनी विफलता को कमज़ोरी मान कर बैठ जाते हैं। उसी प्रकार जब हम छोटे होते हैं तो सब बच्चों की तरह हमे भी आईस्क्रीम, कार्टून और खिलौने मन को भाते हैं ; पर जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं वैसे-वैसे हमे लगने लगता है कि हमारी पसन्द, इच्छाएँ, और हमारा लक्ष्य औरों से अलग हैं। यहाँ तक कि हम अपने सगे भाई-बहनों से भी स्वयं को भिन्न पाते हैं। ऐसी स्थिति मे हम एकांत अनुभव करते हैं क्योंकि हमे लगता है यहाँ कोई हमे समझने वाला नहीं है। इन सब के अलावा एक और चीज़ जो हमारे लक्ष्य प्राप्ति मे बाधा बन कर खड़ी होती है, वह है पक्षपात। हमारे देश मे प्रतिभाऐं बहुत है परन्तु अवसर बहुत कम। अवसर उन्हीं को मिलता है जिनके पास करोड़ों का बैंक बैलेन्स हो , नेता-मंत्री से अच्छे सम्बन्ध हो, सुन्दर व्यक्तित्व हो इत्यादि। इन आधारो पर हो रहे पक्षपात हमारे यहाँ अकसर देखने को मिलते हैं। उपयुक्र्त इन चार बाधाओं को हम अनदेखा नहीं कर सकते क्योकि माॅनसून की तरह यह भी हमारे जीवन मे समय के अनुसार आती जाती रहती है। हमें इन्हें स्वयं पर हावी नहीं होने देना चाहिए। जिस प्रकार बरसात आने से पहले हम छतरी का बन्दोबस्त कर लेते है, उसी प्रकार इन बाधाओं से बचने के लिए हमे एक छतरी हमेशा अपने पास रखनी चाहिए। आप जिस भी आयु वर्ग के हों, आपको खुश दिखने के लिए नहीं वरन् वास्तव मे खुश रहने के लिए जीना है और अपने भीतर की चिंगारी को हमेशा जलाए रखना होगा। सतत्, सार्थक और सकारात्मक प्रयास ही आपके मार्ग को प्रशस्त करेगा।




( प्रसिद्ध लेखक चेतन भगत के एक वक्तव्य से प्रेरित)

Friday, 18 April 2014

आपका एक गलत वोट किसी भ्रष्ट को बना सकता है देश का कर्ता-धर्ता




चुनावी सरगर्मियाँ ज़ोरों पर है। देश के प्रत्येक क्षेत्र एवं कस्बों मे मतदान प्रकिया निरन्तर जारी है। सभी पार्टियों ने चुनावी प्रचार-प्रसार मे कोई कसर नहीं छोड़ी है। विभिन्न शहरों मे आयोजित रैलियों में बोले गए अपने भाषणों मे कोई मंहगाई व गरीबी खत्म करने की बात कर रहा तो कोई भ्रष्टाचार के साथ-साथ भ्रष्ट नेताओं और पूँजीपतियों को झाड़ू से किनारे लगाने का संकल्प ले रहा है। प्रत्येक टी0वी0 चैनलों व अखबारों के द्वारा अपना गुणगान करने वाली विभिन्न पार्टियों की छवि से जनता पूर्ण रूप से अवगत हो चुकी है। पहले की अपेक्षा अब देश का प्रत्येक नागरिक अपने मताधिकार के प्रति जागरूक हो चुका है। देश की 80 प्रतिशत जनता मतदान बूथ जा कर अपने मनपसन्द प्रत्याशी को वोट देती है।

हमारे देश मे पसन्द का प्रत्याशी से तात्यपर्य यह नहीं लगाया जाता कि वह जनता की अपेक्षाओं पर पूरा उतरे,, गरीबों का उत्थान करे,, समाज का विकास करे इत्यादि परन्तु इसके ठीक उलट भारत की 50-60 प्रतिशत जनता अपनी जाति-धर्म से खड़े उम्मीदवार को चुनती है। जब सरकार जनता की उम्मीदों पर पूरी नहीं उतरती तब हम चयनित नेता को दोष देते है परन्तु हम यह क्यों भूल जाते है कि भारी मतों से जिता कर हमने ही तो उन्हें कुर्सी तक पहुँचाया है। हम मीडिया के सामने नारा लगाते है कि ‘‘भ्रष्टाचार हटाओ, भ्रष्ट नेताओं को हटाओं’’ परन्तु इन्हें भ्रष्ट बनाने वाले हममे ही से कुछ लोग है। हमारे देश मे प्रतिभा की कमी नहीं है। बड़े-बड़े पूँजीपति जिन्हें हमारे युवा अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते है, वे धरती से आकाश तक कैसे पहुँचे उसका खुलासा आए दिन अखबारों और टी0वी0 चैनलों मे होता रहता है। वे अपनी प्रतिभा का उपयोग कुछ इस प्रकार करते है- गरीब-मज़दूर किसानो की ज़मीन हड़प कर पावर-प्लान्ट खड़ा करने की सरकार से अनुमति, शराबखाने, माॅल व निजी कम्पनियों का लाईसेन्स प्राप्त करना, उपजाऊ ज़मीन पर फैक्ट्री बनवाना इत्यादि। व्यापारियों एवं कारोबारियों ने व्यावसायीकरण का गलत लाभ उठाया है। इनका सरकार से गठबन्धन होता है। सरकार इन्हे हर गैर कानूनी कार्य की अनुमति देती है और ये अपने मुनाफे का कुछ प्रतिशत सत्ताधारियों को देते है। बड़े-बड़े नेताओं की संध्या की चाय इन व्यापारियों के मेहमानखानों मे होती है। इनका एजेण्डा एक-दूसरे को आर्थिक लाभ पहुँचाना होता है। इनके आपसी मुनाफे से जनता को किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है इससे इन्हें कोई सरोकार नहीं।

आज हर आदमी बढ़ती मंहगाई की मार झेल रहा है। देश की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की दर मे न के बराबर वृद्धि हो रही है। वृद्धि की बात करे तो पिछले दो दशको मे देश मे भ्रष्टाचार और अपराधिक गतिविधियों मे निरन्तर वृद्धि हो रही है। अपराधियों के भीतर सरकार का भय समाप्त हो चुका है। बड़े से बड़ा अपराध करने के उपरान्त दोषी जुर्माने या बेल पर छूट जाता है और यदि जनता की ओर से दबाव बढ़ता है तो 2-5 साल की सज़्ाा दे कर अपराधी को रिहा कर दिया जाता है। दोषी यही सोचता है कि जब देश की सरकार ही बड़े से बड़े घोटाले मे लिप्त है तो हमारे छोटे-मोटे जुर्म करने से क्या बिगड़ जाएगा। अभियुक्त को यह लगता है कि जितना मुनाफा कमाना है कमा लो, यदि पकड़े भी गए तो भ्रष्ट नेताओं की तिजोरी भर कर रिहा हो जाएगें।

स्वतंत्र भारत में यही क्रम 1952 से सतत् चला आ रहा। हम मतदान के समय विधिवत विचार नहीं करते और बिना सोचे-समझे किसी भी प्रत्याशी को वोट दे कर विजयी बनाते हैं। देश की जनता को चाहिए कि वे अपने मत का मूल्य समझे और पूर्ण विचार के बाद अपने मत का सही प्रयोग करें । मतदाता अधिकार के चलते इस बार संसदीय चुनाव प्रक्रिया मे ‘‘नोटा’’ ;छव्ज्।.छवदम व् िज्ीम ।इवअमद्ध का प्रयोग प्रारम्भ किया गया है। इसके अधीन यदि मतदान सूची मे कोई भी प्रत्याशी आप की उम्मीदों पर पूरा नहीं उतरता तो आप ‘‘नोटा’’ बटन दबा सकते है जिसका आश्य यह होगा कि आपने ऊपर की सूची मे दिए गए किसी भी प्रत्याशी को नहीं चुना है।

किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता को यह अधिकार देती है कि वह निर्वाचन के द्वारा विभिन्न पार्टियों से खड़े उम्मीदवारों का चयन करें और योग्य एवं उचित प्रत्याशी को वोट दे। एक स्वच्छ एवं स्वस्थ निर्वाचन का तरीका यह है कि हमे जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और कुनबे के आधार पर नहीं वरन् पार्टी की अच्छी छवि और जनता व पूर्ण देश के विकास के लिए उसका समर्पण और बेहतर कार्यों के आधार पर वोट देना चाहिए। चूँकि भारत की 75 प्रतिशत आबादी युवा है इसलिए युवाओं का एक-एक मतदान अमूल्य सिद्ध होगा। यदि वे आने वाले दिनो मे अपना उज्जवल भविष्य एवं क्षेष्ठतर जीवन की कामना करते है और आने वाली पीढ़ी को एक विकसित भारत मे सांस लेने का सुख प्रदान करना चाहते है तो उन्हें अपने मताधिकार को बखूबी समझना और उसका उचित प्रयोग करना होगा।

यदि हम दृष्टि डालें ता ज्ञात होगा कि हमसे पीछे आज़ादी प्राप्त करने वाले देश अपने अच्छे और ईमानदार नेतृत्व के चलते आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य, चिकित्सा, कृषि आदि मामलों मे हमसे बहुत आगे निकल चुके हैं। वहीं हमारी आर्थिक दशा दिन प्रति दिन बद से बदतर होती ता रही है। हम आम जनता की बुनियादी आवश्यकताओं को ही पूरा नहीं का पा रहे है तो उनके विकास की बात करना तो अर्थहीन है। निर्वाचन मे चुने गए लोग पूँजीपतियों की कठपुतली बन जाते है। वे केवल भारत की उन 5 प्रतिशत जनता को लाभ पहुँचाने और उनके व्यवसाय को शीर्ष तक पहुँचाने मे अपना सम्पूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं जिनका घर पहले ही बड़ी-बड़ी तिजोरियों से भरा है। यह सब होता है हमारे मतों द्वारा अविवेकपूर्ण ढ़ंग से चुने गए सांसद व विधायक के कारण। निर्वाचन परिणाम के बाद यह देखने को मिलता है कि जिन प्रत्याशियों के ऊपर अपहरण, बलात्कार, डकैती जैसे मामले चल रहें है उन्हे जनता भारी मतों से विजयी बनाती हैं। इन नेताओं को वोट मिलता है अपने धर्म, जाति व बिरादरी के लागों से और उनसे जिन्हें वे प्रचार-प्रसार के दौरान भारी रकम या कीमती वस्तु घूस के रूप मे दे कर अपनी ओर कर लेते है। या यूँ कहें जनता अपना अमूल्य वोट लालच के कारण इन भ्रष्ट नेताओं का बेच देती है। यह अवधारणा इसलिए इतनी तेज़ी से फैल रही है क्योंकि अब भारतीयों मे ‘‘हम’’ से परे ‘‘मैं’’ वाली सोच हावी हो गई है। देश का भविष्य क्या होगा इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। निर्वाचन आयोग ने ऐसे प्रत्याशियों को टिकट देने से सख्ती से मना किया है जिन पर किसी प्रकार की रिपोर्ट दर्ज हो या मुकदमे चल रहे हों। पर कोई भी पार्टी इन नियमों का पालन नहीं कर रही और ऐसे दोषियों को अपने प्रतिनिधि के रूप में खड़ा कर रही है। अब यह हमारा कर्तव्य बनता है कि साफ छवि वाले प्रत्याशियों को अपना अमूल्य मत दें और लोकतंत्र का सही अर्थों मे लाभ उठाऐं।

भारतीय लोकतंत्र के चारो स्तम्भ न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस सभी मे घुन लग गया है। सब के सब केवल अपने लाभ के लिए भ्रष्ट नीति अपनाए हुए हैं। इस निर्वाचन मतदाताओं को देश की दुर्दशा के जि़म्मेदार इन नेताओं को सबक सिखाते हुए एक अच्छा प्रदर्शन करना होगा ताकि देश का भविष्य उज्जवल बन सके। मतदान करना केवल हमारा अधिकार नहीं वरन् कर्तव्य भी है। अतः प्रत्येक नागरिक को देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पूर्ण रूप से निर्वहन करना होगा। ज़रूरत है देश को एक नयी दिशा की ओर ले जाने की। युवा भारत का कर्तव्य केवल नारा लगाना की नहीं बल्कि देश को विकसित, भ्रष्टाचार मुक्त, गरीबी मुक्त देश बनाने का है। एक ऐसा देश जहाँ नेता-मंत्री अपने लाभ के लिए नहीं, जनता के लाभ के लिए समर्पित हों। इसलिए बहुत सोच-समझ कर अपना नेता चुनें क्योंकि आपका एक गलत वोट किसी भ्रष्ट को देश का कर्ता-धर्ता बना सकता है।