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Monday, 4 August 2014

प्रेम, सौहार्द और आत्मानुशासन का महीना है रमज़ान






रमज़ान इस्लामिक कैलेण्डर कर नवाँ महीना है। इस महीने में विश्व भर के मुसलिम समुदाय के लोग व्रत रखते हैं, जिसे रोज़े के नाम से जाना जाता है। रोज़ा इस्लाम के पाँच स्तम्भों मे से एक है, जिसे साल मे एक बार 29-30 दिनों के लिए मनाया जाता है। इस्लामिक कैलेण्डर चाँद पर आधारित होता है। नया चाँद देख कर नया महीना शुरू किया जाता है। नौवाँ महीने यानी कि रमज़ान का चाँद देखकर रोज़्ाा शुरू किया जाता है, जो कि अगले महीने ईद का चाँद देखकर सम्पन्न होता है।

रमज़ान माह मे रोज़ा रखना हर मुसलमान ( 13 साल की उम्र से ) के लिए आवश्यक होता है जिसे इसलामिक भाषा में फजऱ् कहते है। रोज़ा पाँच फजऱ् मे से एक है जिसको पूरा करना हर मुसलिम का परम धर्म है। बड़ों की देखा-देखी 8-9 साल के बच्चे भी उत्सुकतावश रोज़े रख लेते हैं। रमज़्ाान माह मे रोज़ा प्रतिदिन प्रातः पौ फटने से पहले प्रारम्भ होता है और संध्या सूर्यास्त के पश्चात समाप्त होता हैंै। सूर्योदय के पूर्व सभी लोग उठ कर हलका भोजन करते हैं जिसे ‘सेहरी’ कहते हैं। सेहरी के बाद दिन की पहली नमाज़ फजर अदा की जाती है। उसके बाद पूरा दिन खाने, पीने, बीड़ी, सिग्रेट से दूरी बना कर पाक कुरान की तिलावत करते हैं व समय-समय पर नमाज़ पढ़ी जाती है। सूर्योदय के बाद दिन की चैथी नमाज़ मगरिब की आज़ान सुन कर रोज़ा खोला जाता है। पैगमबर मोहम्मद स0 अ0 ने खजूर ( एक अरबी फल) से रोज़ा खोलने की सलाह दी है, जो कि सेहत के लिए बहुत फायदेमन्द होता है। रोज़ा खोलने के लिए तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते है, जिसे इफतार कहते है। फिर रात्रि में खाने के बाद पाँचवी नमाज़ इशा के साथ विशेष नमाज़ तरावीह पढ़ी जाती है। तरावीह मे कुरान की आयतों को दोहराया जाता है जिसे तीस दिनों मे कुरान के तीस अध्याय (पारा) को एक-एक कर के नमाज़ मे पढ़ा जाता है। कुछ मस्जिदों मे तरावीह के दौरान हाफिज़ (जो जमात को नमाज़ पढ़ाते हैं) एक दिन मे कुरान का एक पारा पढ़ाते हैं तो कुछ मे एक दिन मे तीन, पाँच या दस पारेे पढ़ाते है। इस प्रकार किसी मस्जिद मे तरावीह तीस दिनो मे पूरी होती तो किसी मे दस, छः व तीन दिनो मे ही पूरी कर दी जाती है। मुसलिम समुदाय मे सुन्नी वर्ग के लोग तरावीह को सुन्नत-उल-मुक्कदाह मानते है, जिसका आशय है वह नमाज़ जिसे पैगमबर मुहम्मद स0 अ0 पढ़ा करते थे।

रमज़ान माह मे केवल खाने-पीने से ही परहेज़ नहीं होता बल्कि हर रोज़ेदार को अपशब्दों का प्रयोग, ईष्र्या-द्वेष , चुगलखोरी, मार-पीट, चोरी इत्यादि जैसे हर बुरे काम से दूरी बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक होता है। अन्यथा रोज़ा सही मायने मे पूरा नहीं होता। धार्मिक पुस्तक कुरान के दूसरे अध्याय मे यह कहा गया है कि रमज़ान मानवता, भाईचारे  व अच्छे कर्मो को करने का महीना है। ईश्वर ने हमे जो कुछ दिया है उसके लिए हमें उसका धन्यवाद देना चाहिए और अज्ञानतावश किए गए बुरे कर्मो के लिए माफी माँगनी चाहिए। रोज़्ाा रख कर हमें भूख का एहसास होता है जिससे हमे यह आभास होता है कि जिन्हें दिन मे एक वक्त खाने को नहीं मिलता उन पर क्या गुज़रती होगी। इस प्रकार हम ज़रूरतमन्दों की पीड़ा को समझते है और उनकी मदद के लिए अग्रसर होते है।

यह माना जाता है कि रमज़ान के पावन माह मे अल्लाह ने अपने आखिरी नबी मोहम्मद स0 अ0 पर कुरान प्रकट की थी। इसी कारण इस महीने को इस्लाम मे विशेष पवित्र स्थान प्राप्त है। मोहम्मद स0 अ0 ने सबसे पहले इस माह रोज़ा रखा था। तब से हर मुसलमान इसे पूरी श्रद्धा के साथ रखता आ रहा है। नबी के अनुसार पहला दस रोज़ा रहमत (दया/करूणा) का, दूसरा दस मगफिरत (माफी) और आखिरी दस जहन्नम की आग से आज़ादी का होता है। रमज़ान का आखिरी 10 दिन बहुत पुनीत माना जाता है ; विशेषकर 21वीं, 23वीं, 25वी, 27वीं व 29वीं रात जिसे लयलत-उल-कद्र कहते हैं। इन्हें पवित्र रात भी कहते हैं क्योकि इसी समय पवित्र कुरान धरती पर उतारी गई थी। इस रात हर मुसलमान पूरी श्रद्धा के साथ रात भर नमाज़ व कुरान पढ़ता है और अल्लाह से  अपने गुनाहो की माफी माँगता है, उसकी दी हुई नेअमतों (असाईश) के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है व मरने के बाद जन्नत नसीब होने की ख्वाहिश करता हैै। रमज़ान का महीना हर मुसलमान को आत्मानुशासन, त्याग/बलिदान, ज़रूरतमन्दों के लिए सहानभूति का पाठ पढ़ता है और उन्हें उदारता की ओंर प्रेरित करता है। यह मान्यता है कि इस रात किया गया पुण्य पूरे 1000 साल के पुण्य करने के बराबर है।

गरीबों को दान देना जिसे इस्लाम मे ज़कात कहते है, यह भी इस्लाम के पाँच स्तम्भों मे से एक है। रमज़ान माह मे लोग ज़कात और सदकाह अधिक से अधिक करते है क्योंकि यह माना जाता है कि इस माह मे हर पुण्य का फल 70 गुणा बढ़ कर मिलता है। ईद की नमाज़ के पहले जान और माल का सदकाह देना आवश्यक होता है। सदकाह वह रकम होती है जिसे ज़रूरतमंदो व गरीबों को देना हर मुसलमान का कर्तव्य होता है। ईश्वर ने हमें मानव जीवन, रूपया-पैसा व अन्य असाईशे प्रदान की है तो उसका एक छोटा हिस्सा गरीबों को देना चाहिए। इसके पीछे यह धारणा है कि यदि ईश्वर ने हमें हर प्रकार की सुख-सुविधा प्रदान की है तो हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए और उनकी मदद से हमें आत्म सुख की प्राप्ति के साथ-साथ पुण्य भी मिलता है।

तीस दिनों के रोज़े के बाद ईद-उल-फितर का पर्व मनाया जाता है। इस दिन सारे लोग मस्जिद में इकठ्ठे हो कर नमाज़ अदा करते हैं, नए कपड़े पहनते है, दोस्तों को मुबारकबाद देते हैं और घर-घर सिवईयाँ ( एक प्रकार का मीठा व्यन्जन ) बनाई जाती हैं। ईद का पर्व तीस दिन के रोज़े का इनाम होता है जिसे बच्चे से बूढ़े खुशी-खुशी मनाते है। चूँकि इस्लामिक कैलेण्डर चाँद पर आधारित होता है इसलिए चाँद के हिसाब से हर साल रमज़ान का महीना बाकी इस्लामिक महीनों की तरह 10 दिन पीछे खिसक जाता है।

रमज़ान माह में रोज़ा अर्थात व्रत रखना वैज्ञानिक रूप से भी लाभदायक है। विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर एक मशीन की भाँति है जिसका लगातार चलना उस मशीन के लिए नुकसानदेह हो सकता है। सही दशा में संचालन हेतु मशीन को नियमित विश्राम देना चाहिए। इसी प्रकार मनुष्य को व्रत रखकर पेट को भी कुछ समय के लिए आराम देना चाहिए ताकि पाचन तंत्र सही प्राकर से काम करता रहे। रोज़ा रखना स्वास्थ्य के लिए कई तरह से लाभदायक होता है। यह दिमागी क्रिया को तेज करता है, तनाव दूर करता है, रक्त चाप, कैलेस्ट्रौल व मधुमेह को नियंत्रित करता है और शरीर की अनचाही चर्बी अर्थात मोटापा को खत्म करता है। एक महीने की इस तपस्या से लोगों में धर्म के प्रति आस्था, इस्लामिक आदर्शों के प्रति श्रद्धा, व्यक्ति के आचरण मे दया, धर्म, प्रेम आदि दैवी गुण आ जाते हैं जिससे उनका भावी जीवन सुधर जाता है।