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Monday, 22 October 2012

खतरे की घंटी

मोबाइल की रिंग बजते ही आपको एक तरह की ख़ुशी का अनुभव होता  है कि कोई अपना  आपको याद कर रहा है लेकिन ये घंटी आपके लिया कहीं खतरे की घंटी न बन जाए। आज मोबाइल फोन रखना केवल शौक ही नहीं बल्कि रोज़मर्रा की ज़रूरत बनता जा रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बातचीत के दौरान इसमें से निकलने वाले रेडियेशन किस हद तक खतरनाक हो सकते हैं। जी हाँ वैज्ञानिक तौर पर यह साबित हो चुका है कि आधा से एक घंटा लगातार बात करने से मोबाइल फोन से एक तरह का रेडियेशन, जिसे हम तरंग कहते हैं निकलती है जो हमें खतरनाक और जानलेवा बिमारियों की ओर अग्रसित करती हैं। इतना ही नहीं मोबाइल फोन पर तो बात करने करने के दौरान ही रेडियेशन निकलते हैं परन्तु हमारे घर के आस पास - पास लगे विभिन्न कम्पनियों के टावर से लगातार 24 घंटे ऐसे रेडियेशन निकलते रहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये तरंग इस हद तक घातक होतीं हैं कि डिप्रेशन , थकान , चिडचिडापन और यहाँ तक कि कैंसर , ब्रेन ट्यूमर जैसी बड़ी बिमारियों का रूप धारण कर सकतीं हैं . इस तरह के कई केस सामने आए हैं। मोबाइल की लो बैटरी पर यदि बात की जाए तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है।
मोबाइल फोन कम्पनियों के टावर से निकलने वाले रेडियेशन का एक मानक तैयार किया गया है जो सरकार द्वारा आने वाले दिनों में लागू  किया जायेगा। तय किये गए मानक से अधिक रेडियेशन निकलने पर सम्बंधित मोबाइल कंपनियों को जुर्माना देना पड़ेगा।
मोबाइल का हर समय बजना या हर समय उस पर बात करना उतना ही बुरा है जैसा ड्राइंग-रूम में बैठे चभड़ चभड़ करना। कुछ लोग बात करने का बहाना ढूँढ़ते हैं।  ज़रूरत से ज़्यादा 3-3, 4-4 फोन रखते हैं। दोस्तों, रिश्तेदारों व निजी लोगों से फुरसत मिल गयी तो कुछ नहीं तो टेली-कॉलर की ही बकवास सुनने बैठ गए। लुभावनी स्कीमें सुनते ही यह स्वाभाविक है कि यदि बात में थोड़ा दम है तो उत्सुकता पैदा हो जाती है और आप बेरुखी से फोन नहीं काटते। एक और मुसीबत तब होती है जब टेली-कॉलर उस बैंक का नाम लेता है जिसमे आप का खाता हो। आप को लगता है कहीं यह असली कॉल न हो, आप के अपने बैंक से। फिर आप उसकी नई-नई स्कीमों में फंसते हुए घंटो लगे रहते हैं।
कहते हैं न जान है तो जहान है। तो फिर इसकी शुरुवात हमें आज से नहीं बल्कि अभी से करनी चाहिए। मोबाइल पर उतनी ही बात करें जितनी ज़रूरी हो और अपने आस-पड़ोस में लगे विभिन्न मोबाइल कंपनियों के टावर से निकलने वाले रेडियेशन की भी जानकारी रखें और तय किये गए मानक से अधिक रेडियेशन निकलने पर तुरंत सम्बंधित अधिकारी को सूचना दें।  

Monday, 6 August 2012

किस्मत की लकीरें

हम में से अकसर लोगों को ये कहते सुना होगा कि अगर हमारी किस्मत में होगा तो ज़रूर मिलेगा . क्या सचमुच हमारी किस्मत हमारी पूरी ज़िन्दगी का फैसला करती है ? क्या सचमुच हमारी पूरी ज़िन्दगी हमारे भाग्य पर निर्भर करती है ? 
कभी - कभी हम जिस चीज़ को पाने का जी तोड़ प्रयास करते हैं वह चाह कर भी हमें नहीं मिलती . वहीँ कुछ चीज़ें बिना किसी मेह्नत के बिन मांगे ही ऊपर वाला हमारी झोली में डाल देता है . लेकिन हम इंसानों की फितरत ही ऐसी है कि जो चीज़ आसानी से बिना किसी प्रयास के हमें मिल जाती है उसका हमारी नज़र में कोई महत्व नहीं होता और जो चीज़ हमारी पहुँच से दूर होती है उसे पाने कि नाकाम कोशिश में हम अपना जी-जान लगा देते हैं . हजारों कोशिशों के बाद जब हम उसे पाने में असमर्थ हो जाते हैं तो यह कर हाथ झाड़ लेते हैं कि वह हमारी किस्मत में ही नहीं था .
आज हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहे हैं जहाँ लोग भाग्य में विश्वास न कर के अपनी मेह्नत और हिम्मत पर विश्वास करते हैं और अपनी किस्मत खुद लिखने का हौसला रखते हैं . अगर हम अपने इरादों में सफल हो गए तो उसे अपने अटूट हौसले और कठिन परिश्रम का नाम देते हैऔर अगर हम विफल हो गए तो अपने भाग्य का रोना रोते हैं . यदि हम जीवन की इस पहेली को सुलझा लें कि हमारे भाग्य कि लकीरों में क्या लिखा है और क्या नहीं तो हम अपना बहुमूल्य समय नष्ट होने से बचा सकते हैं .
यह देखा गया है कि लोग ठोकर खा कर ही सीखते हैं और वही लोग जीवन पथ पर अडिगता से चलते हुए सफलता कि डोर थामते हैं .इसी का नाम तो ज़िन्दगी है जो हर पल एक नया पाठ पढ़ाती है , जिसने इसे समझ लिया वह जीवन की परीक्षा में आसानी से पास हो गया और जिसने नहीं समझा वह यूँ ही दर-दर भटकता रहा .

Friday, 27 July 2012

कब सुबह होगी

कहते हैं हर सफल पुरुष की सफलता के पीछे एक महिला का हाथ होता है . कभी माँ के रूप में , कभी पत्नी , कभी बहन या कभी एक दोस्त के रूप में वह हर पल उसका हौसला बढाती है और हर मुश्किल हालात में उसका साथ देती है . लेकिन एक महिला के लिए अपनी मंजिल तक पहुँचना आसान नहीं होता . हमारे समाज की खोखली परम्पराएँ और कुप्रथाएँ चट्टान की तरह उसका रास्ता रोके खड़ी रहती हैं .
कहने को तो हमारा देश बहुत तरक्की कर चुका है जहाँ लड़का - लड़की के समान अधिकार की बात कही जाती है पर आज आज़ादी के 65 साल बाद भी  महिलाओं की स्थिति में नाममात्र ही बदलाव आया है . माता - पिता लड़कियों को शिक्षा दिलाने में तो कोई संकोच नहीं करते लेकिन पढाई के दौरान या पूरी होते ही वे इस उधेड़बुन में लग जाते हैं कि  उसके लिए अच्छे से अच्छा वर तलाश किया जाए , ये जाने और सोचे बगैर कि इस तरह वे अपनी लाडली की आँखों में बरसों से  सजे ख्वाब को  बेदर्दी से नोच कर फ़ेंक देते हैं जिनको अब हकीकत का रूप मिलने वाला था . वे अपनी जगह गलत भी नहीं होते बस चाहते हैं कि जल्द से जल्द अपने फ़र्ज़ से बरी हो जाएँ . हर व्यक्ति चाहे वह लड़का हो या लड़की अपने उज्जवल भविष्य की कामना तब से करने लगता है जब वह स्कूल में अपना पसंदीदा विषय चुनता है . आज का युवा अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है . प्रतिस्पर्धा की इस लम्बी दौड़ में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता है . जब नौकरी की बात आती है तो लड़कियों को समाज का ही नही बल्कि अपने घर वालों का ही समर्थन नहीं मिलता .  उन्हें यह कह कर घर में बिठा दिया जाता है कि लोग क्या कहेंगे.., रिश्तेदार क्या कहेंगे.. . मुस्लिम महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है . माता - पिता ये समझ कर भी नहीं समझते कि आज की मतलब-परस्त दुनियाँ में कोई किसी को खुद से आगे नहीं देखना चाहता इसलिए हर कोई सामने वाले का मनोबल तोड़ने में लगा रहता है . महिलाएं अगर समाज की परवाह करना छोड़ दें तो उनके लिए कुछ भी पाना मुश्किल नहीं .
कभी परिवार तो कभी समाज की दकियानूसी रीति-रिवाजों के नाम पर महिलाओं की प्रतिभा का गला घोंटा जा  रहा है , जबकि सभी को अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी मंजिल पाने का अधिकार है . हमारा देश आज भी पश्चिमी देशों के मुकाबले इतना पिछड़ा हुआ इसलिए है क्योंकि यहाँ कुछ महानगरों को छोड़ कर छोटे - बड़े शहरों में महिलाओं को पुरषों जितना अधिकार और आज़ादी नहीं है . वे चाह कर भी दुनिया से कदम से कदम मिला कर नहीं चल सकती और न ही अपनी मर्ज़ी से अपना प्रोफेशन चुन सकती हैं . इस वजह से हमारी राष्ट्रिय आय में महिलाओं की सहभागिता बहुत कम है , जबकि पश्चिमी देश इस मामले में हमसे बहुत आगे है  क्योंकि  महिला और पुरुष बिना किसी अंतर के पूरी आज़ादी से अपना भविष्य चुनते हैं .
कहा जाता है , बुलंद हौसला और खुद पर अटूट विश्वास हो तो मंजिल पाना मुश्किल नहीं , लेकिन हमारे यहाँ महिलाओं के लिए अपनी महत्वकान्छओं से ज्यादा अपनों के मान का पास रखना ज़रूरी होता है . आखिर कब तब तक महिलाओं को अपनी ख्वाहिशों और चाहतों का गला घोटना पड़ेगा ? कब तक उसे लोगों से दब कर एक कठपुतली की तरह इशारों पर नाचना  होगा ? कब तक उसे सामाजिक रीति-रिवाज़ और दकियानूसी परम्पराओं की आग में झुलसना होगा ?आखिर कब तक...............???

Tuesday, 24 July 2012

दिल तो बच्चा है जी

हर किसी के जीवन में कभी न कभी एक ऐसा मोड़ आता है जब उसे अपना मन मार कर दिमाग से फैसला लेना होता है . दिमाग दिल पर हावी हो जाता है जब इन्सान को खुद से ज़्यादा अपनों की खुशियों और मान की चिंता होती है . अपनी हर तमन्ना पूरी कर लेने को हमारा दिल हमें उकसाता है ये सोचे और जाने बगैर कि हमारी एक छोटी सी ख्वाहिश हमारे अपनों की खुशियों का गला घोंट देगी . हमारा दिल एक बच्चे की तरह होता है जो हर अच्छी चीज़ की तमन्ना कर बैठता है और जब वो चीज़ हमारी पहुँच से दूर हो जाती है तो हमारे शरीर के इस छोटे से हिस्से को ऐसी चोट पहुँचती है कि लगता है उसके बिना हमारा पूरा जीवन ही व्यर्थ है . दूसरी ओर हमारा दिमाग कोई भी निर्णय लेने से पहले सौ बार ये सोचता है कि ये हमें और हमसे जुड़े लोगों को किस हद तक प्रभावित करेगा .
हममे से कुछ लोग अकसर इस गुत्थी में उलझे रहते हैं कि कोई भी फैसला दिल से लिया जाए या दिमाग से . बड़े-बूढ़े कह गए हैं फैसला चाहे दिल से किया जाए या फिर दिमाग से, अगर उससे हमारे अपनों को चोट पहुँचती है तो वह हरगिज़ सही नहीं है . जिस ख़ुशी में बड़ों की दुआएँ न हो वह ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक सकती . लेकिन इस नन्हें-मुन्ने से जिद्दी दिल को कैसे समझाएँ, क्योंकि दिल तो बच्चा है जी .

Tuesday, 19 June 2012

क्या कोई चेहरा चाँद जितना खूबसूरत हो सकता है

तारों से टिमटिमाते आसमान को मैं जब भी देखती हूँ तो ऐसा लगता है मानो हज़ारों सितारों से झिलमिलाता काला आँचल ओढ़े हमारी धरती मुसकुरा रही हो . वहीँ अपनी पूरी आन - बान से खड़ा लश्कारे मारता चाँद किसी अनमोल नगीने की मानिंद लगता है .
कभी - कभी मेरा मन करता है कि इन चमकते तारों को चुन - चुन कर अपनी मुट्ठियों में भर लूं पर अफ़सोस उन्हें छूना तो दूर हम तो  उनके असली आकार में देख भी नही सकते . हमारी धरती से कई सौ गुणा बड़े ये तारे धरती से बहुत दूर होने की वजह से हमें इतने छोटे दिखाई देते है . वहीँ दूसरी ओर जब भी मैं चाँद को देखती हूँ तो मेरी नज़र उस सुनहरे बालों वाली परी को ढूँढने लगती है जिसकी कहानियाँ बचपन में दादी - नानी से सुना करती थी . वह सुनहरे बालों वाली खूबसूरत परी तो अब बूढ़ी भी हो गई होगी लेकिन चाँद अपनी पूरी शान के साथ आज भी वैसे ही चमक रहा है .
अकसर लोग ख़ूबसूरती को चाँद से जोड़ते हैं लेकिन मैं सोचती हूँ कि क्या कोई चेहरा चाँद जितना भी खूबसूरत हो सकता है जिसमे एक काला धब्बा होते हुए भी उसकी चमक में कोई कमी नहीं आई है . इस अदभुत्त दुनियाँ में ऐसी बहुत सी अदभुत्त चीज़ें हैं जिनका एक सिरा पकड़ कर हम समुन्दर की गहराइयों में गोते खाने लगते हैं . 

Thursday, 3 May 2012

बीते लम्हे

वो दोस्तों से झगड़ना,बात न करना और फिर खुद ही मान जाना.भरी महफ़िल में एक दूसरे की जम कर खिचाई करना और को खुद उनसे बेहतर साबित करने की जी तोड़ कोशिश में जुट जाना.वो ऑटो रिक्शा में हम 
चारो का एक ही सीट पर ठूस ठूस कर बैठ जाना और मस्ती करते हुए हस्ते हस्ते लोट पोट हो जाना.यूँ ही बातों बातों में पलक झपकते ही रास्तों का कट जाना.वो लंच टाइम में एक दुसरे से छीन झपट  कर खाना,फिर भी पेट न भरे टीचर्स की टिफ़िन पर डाका डालना.वो लेक्चर के बीच मिस कॉल कर-कर के दूसरों का ध्यान भटकाना और नोट्स मांगने पर बातों-बातों में टरकाना.वो टीचर्स का हमें डांटना और प्यार से समझाना, क्लास में उलटी सीधी हरकतों से उनको सताना.फिर भी डांट न पड़े तो सवाल पूछ पूछ कर उनका दिमाग खा जाना.वो एक दुसरे 
की शिकायत कर डांट खिलवाना और जब खुद की बारी आए तो मैदान-ए-जंग में उतर जाना.
क्या दिन था वो यूनिवर्सिटी का  सुहाना, जहाँ हर रोज़ बनता था एक नया अफसाना .
हाथ से भुरभुरी रेत की तरह जाने कब फिसल गए ये दो साल हमारे.वो 
लम्हे वो यादें हमेशा महफूज़ रहेंगे दिल में हमारे.........


यादों के पन्नो को हमने जब भी पलट कर देखा ...!
दोस्तों के साथ कभी झगड़ते कभी खुद को हसते देखा ....!

Thursday, 26 April 2012

मुस्कुराइए कि आप भारतवासी हैं

आइये भीड़ में खो जाइये ,मुफ्त में धक्के खाइए . गाड़ियों का ज़हरीला धूँवा पी जाइये ,और आंसू बहाइये . गड्डों से खुद को बचाइए .अगर गिर पड़े तो टांग सहलाइए और टांग पर प्लास्टर बंधवाइए . घर जा कर जहाँ चाहिए वहां कूड़ा गिराइए और गन्दगी फैलाइए . क्यों नहीं ! यह देश आप का ही तो है . हर समय मौके की तलाश में रहिये . मौका पाते ही मेनहोल के ढक्कन चुराइए और बाद में उसमे ही छपाक से गिर जाइये . हिन्दुस्तानी तहज़ीब भुला कर एक - दुसरे पर बक- बकाइये  . खुद मानवता भूल कर सबको मानवता का पाठ पढ़ाइये .
क्या यह ठीक है ?
आप ही बताइए ? 
तो आइये भाईचारे , प्यार , और सभ्यता के बीज उगाइये . तहजीब के गीत गुनगुनाइए और इसलिए गुनगुनाइए    
क्योंकि आप भारतवासी हैं .
तो फिर मुस्कुराइए की आप भारतवासी हैं .

Wednesday, 25 April 2012

ये है यंगिस्तान

जहाँ एक ओर लोग भारतीय संस्कृति , संस्कार और सभ्यता की बात करते नहीं थकते थे वहीँ आज यहाँ की युवापीढ़ी फैशन के नाम पर भाषा का गलत इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रही है .
फैशन के इस दौर में नौजवान पीढ़ी पढाई - लिखाई और बुज़ुर्गों के सम्मान में भले ही कंजूसी कर ले लेकिन अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाती . जिस तरह आज पिज़्ज़ा और सैंडविच के बिना हमारी पार्टी अधूरी होती है वैसे ही हममे से कुछ लोगों की बिना गालियों के बात पूरी नहीं होती . किसी के मना करने पर बड़ा ही सीधा सा जवाब दिया जाता है -"ये आजकल का ट्रेंड है " .फैशन के नाम पर मॉडर्न कहलाने  वाली आज की न्यू जनरेशन अभद्र भाषा का इस्तेमाल बड़े ही स्टाइल से कर रही है .
इसकी  शुरुवात होती है हमारी संगत से . हमारे दोस्त जिनके साथ हम उठते -बैठते हैं और फ़ोन-इंटरनेट पर गपशप करते हैं दूसरी ओर आज की युवा पीढ़ी पर फिल्मी जगत का खुमार बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है . हीरो-हीरोइने  के कपडे व हेयरस्टाइल  के साथ साथ हम फिल्मों में इस्तेमाल होने वाली उनकी भाषा को कॉपी करने में बड़ा गर्व महसूस करते हैं . दो दोस्त कुछ इस तरह बात करते पाए जाते हैं -"अरे सा....ले कैसा है तू "या  " कमीने तुने मुझे बताया नहीं " वगैरह -वगैरह . इन अशिष्ट शब्दों को फैशन - ट्रेंड का नाम देने वाले यह भूल गए  हैं कि वह हमारे देश कि संस्कृति को किस मोड़ पर ले जा रहे हैं . लेकिन सोशल वेबसाईट्स के ज़रिये एक सेकेंड्स  में हजारों तक पहुँच बनाने वाले आज के नौजवानों को रोकना मुमकिन नज़र नहीं आता .

Tuesday, 24 April 2012

एक छोटी सी मुस्कान .........बना सकती है आपको महफ़िल की जान .......!!!!

मुस्कराहट को आप गैर अहम् ना समझें ,मुस्कराहट भी एक आर्ट है . यह एक चुम्बकीय असर है जो देखने वालों को अपनी तरफ खींच लेती  है और यह आपकी खूबसूरती में भी इज़ाफा करती  है .
ज़हनी परेशानियाँ और आप का मिजाज़ आप से मुस्कराहट  की दिलकशी छीन लेता है और आप एक खुबसूरत जज़्बे से महरूम हो जाते है . मुस्कुराते चेहरे वाले शख्स से हर कोई मिलना पसंद  करता है चाहे उसका चेहरा इतना खूबसूरत ना हो वहीँ दूसरी ओर माथे पर सिलवटें सजाये शख्स से लोग दूरियां बनाये रखने में ही बेहतरी समझते हैं . यह सच है की हम किसी को कुछ  नहीं दे सकते लेकिन उसके लिए एक मुस्कराहट का तोहफा तो दे ही सकते हैं . याद रखें कि एक उँचा लम्बा कहकहा कभी भी एक नर्म और खूबसूरत मुस्कराहट कि जगह नहीं ले सकता . मुस्कुराना या सलीके से हंसना भी एक फन है .
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हसते हुए ज़ोर- ज़ोर से हाथ पर हाथ मारते हैं , या अपने करीब बैठे हुए किसी को दो हाथ मार देते हैं . यह सब तहज़ीब और वकार के खिलाफ है . आप कि मुस्कराहट का अपना मतलब होना चाहिए. आप अपनी मुस्कराहट के ज़रिये भी अपने जज़्बात का इज़हार कर सकते हैं . मज़ाक, तंज़ , रोमांस यह सारे जज़्बे सिर्फ एक हलकी सी मुस्कराहट से ज़ाहिर किये जा सकते हैं . यकीनी तौर पर आपकी मुस्कराहट को बेमानी नहीं होना चाहिए बल्कि वह अपने मुकम्मल माने ज़ाहिर कर रही .

Monday, 23 April 2012

ग्लोबल वार्मिंग

पिछले कुछ वर्षों से पृथ्वी का तापमान बढ़ता ही जा रहा है , जो आने वाले समय में महाविनाश का संकेत दे रहा है . इसे हम ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जानते हैं . सूरज की किरणे जब पृथ्वी पर पड़ती है तो उसमे से कुछ परावर्तित हो कर लौट जाती हैं जबकि बाकी किरणे वायुमंडल में ही रह जाती हैं जो पृथ्वी के तापमान में बढ़ोतरी का कारण बनती  हैं . हमारे वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैस जैसे कार्बोन-डाईओक्सैड, मीथेन , नाइट्रोजन-ओक्सैड इत्यादि मौजूद होती हैं जो पृथ्वी की ऊपरी सतह में व्याप्त ओज़ोन लेयर में बढ़ते छेद का मुख्या कारण है . इन्ही गैसों  की वजह से पृथ्वी पर पड़ने वाली सूरज की किरणे परावर्तित नहीं हो पाती और तापमान निरंतर बढ़ता रहता है .ग्लोबल वार्मिंग ने प्राकृतिक विपदाओं में कोई कसर नहीं छोड़ी है . बाढ़ ,सूखा ,भूकंप ,बवंडर ,जंगलों में आग ,असमय वर्षा ,बेमौसम सर्दी-गर्मी सब इसी के दुष्परिणाम हैं . ग्लेशियर के पिघलने से समुंदरी सतह का बढ़ना चिंता का विषय है . मौसम की अनियमितता के कारण आज  छोटे-छोटे बच्चों में एलर्जी , अस्थमा  मधुमेह, ब्लड प्रेशर , मोटापा जैसे रोगों ने कब्ज़ा कर लिया है .
यदि हम सब अब भी सावधान हो जाये तो इस संकट का सामना कर सकते हैं . इसके लिए हमें कम से कम पेट्रोल , डीज़ल  , ईधन , और बिजली उपकरण जैसे ए.सी. , मिक्सर , इनवर्टर , वाशिंग मशीन , आदि का कम से कम उपयोग करना चाहिए . गहर के आस-पास पौधे लगाएं . प्लास्टिक बैग  का इस्तेमाल बिलकुल न करें , घर  के आस - पास का कूड़ा कचरा नष्ट करें .पानी का सदुपयोग करें . प्रकृति ने हमें सहारा दिया है तो हमें प्रकृति की सुरक्षा करनी चाहिए .

Thursday, 19 April 2012

विद्यार्थियों में बढती अनुशासन की समस्या

 आज की पीढ़ी में एक समस्या अधिकतर पाई जा रही है और वह है अनुशासन . आज की पीढ़ी में अनुशासन पूरी तरह से गायब होता नज़र आ रहा है  . आधुनिक युग में छात्रों के बीच बढती हुई अनुशासनहीनता चिंता का एक विषय है . एक राष्ट्र का निर्माण चट्टानों और पेड़ों से नहीं बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से होता है . एक अनुशासित नागरिक ही उन्नति
 में सहयोग कर सकता है . 
अगर किसी देश का नागरिक अनुशासनहीन हो तो वह देश विनाश के मार्ग पर चला जायेगा . किसी भी देश का भविष्य 
उसके युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है . लेकिन जो विद्यार्थी अनुशासन में नहीं रह सकता वो अपने जीवन में कभी सफल 
नहीं हो सकता . अगर हर विद्यार्थी खुद को अनुशासन के सचे में ढाले तो वह अपने जीवन के हर संघर्ष में आसानी से 
सफलता प्राप्त कर सकता है . विद्यार्थी जीवन में मनुष्य हीरा होता है इसे अगर अनुशासन के सांचे में ढाला जायेगा तो यह 
और भी चमक जायेगा . वैसे भी अनुशासन की लगाम जीवन को नियंत्रित  करती है . अगर किसी मनुष्य को अपने जीवन 
के किसी भी लक्ष्य को पाना है तो उसे अनुशासन-प्रिय बनना होगा . 

Thursday, 12 April 2012

जिसकी मज़बूत पनाहों में हम सारी दुनिया से लड़ सकते है..........

जिसने उंगली पकड़ कर हमें चलना सिखाया,जिसने ज़िन्दगी के उबड़ -खाबड़ रास्तों पर हमें गिरने से संभाला . एक शख्स जो हमारे घर का  मुखिया होता है . वह जो हमारे दुख में दुखी और ख़ुशी में खुश होता है मगर कभी हम पर ज़ाहिर नही करता . वह शख्स जो हमारे बुरे वक़्त में हमारा सहारा बनता है . जो एक बार मुस्कुरा कर हमें गले लगा लेता है तो लगता है की हमारे सारे दुख दूर हो गए है . वह शख्स जिसकी मज़बूत पनाहों में आते ही लगता है की हम सारी  दुनिया  से लड़ सकते है . जिसकी वजह से हम गर्व से सर ऊँचा कर के  दनदनाते फिरते है . वह शख्स जो हमारी एक फरमाइश पर अपनी दिन भर की सारी थकान भूल जाता है . उस महान और प्यारी शख्सियत की जगह कोई और  नही ले सकता और वह  है मेरे अज़ीज़... "पापा". 

Wednesday, 28 March 2012

A Documentary On Bapu Bazar ......A Market For Poor People Organised By VBS Purvanchal University Jaunpur. 

Thursday, 22 March 2012

नाकामी ही कामयाबी की कुंजी है




पूजनीय होते है वो लोग जो ज़िन्दगी के कठिन मोड़ पर मुंह के बल गिरते हैं और गिरने के बाद फिर नए जोश-खरोश व  नई उर्जा के  साथ खड़े हो जाते हैं. ऊंचाइयों को छूने  की तमन्ना रखने वाले हर व्यक्ति को अपने जीवन में बहुत  सारी दिकत्तों, परीक्षाओं और कष्टों का सामना करना पड़ता है . लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम अपनी किस्मत को कोसते हुए  अपने बढ़े हुए कदम को पीछे कर लें . हमें तब तक जूझते रहना चाहिए जब तक हमें मंज़िल न मिल जाये . हो सकता है एक-दो प्रयत्न करने पर भी हमे नाकामी का मुंह देखना पड़े . परन्तु निरंतर और अडिग प्रयास ही हमें हमारे सुनहरे भविष्य कि ओर ले जायेगा  . सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं . हमें असफलता को खुद पर हावी न करते हुए एक मकड़ी  कि तरह अपने लक्ष्य को पाने के लिए बार-बार हाथ पैर मारते रहना चाहिए . जितनी बार नीचे गिरेंगे उतनी बार नई आशाओं के साथ दोबारा चढ़ाई करेंगे . हमें अपनी इच्छा शक्ति को मज़बूत करते हुए असफलता का निडरता से सामना करना चाहिए जो कि हमारी कामयाबी कि पहली कुंजी होगी  . 

Wednesday, 21 March 2012

FITRAT

Ham pagal ladkiyan
jane kyon zindagi ke sahil par
khwabon ke gharonde banati hain
ye jaane begair ki
haqiqat ke samundar ki
aik laher hi kaafi hai
unko todne ke liye
Phir kyon
aakhir sab jaante huve
aisa karti hain
shayad pachhtane ke liye
kyonki galtiyan karna aor
pachhtana fitrat hai hamari