हर किसी के जीवन में कभी न कभी एक ऐसा मोड़ आता है जब उसे अपना मन मार कर दिमाग से फैसला लेना होता है . दिमाग दिल पर हावी हो जाता है जब इन्सान को खुद से ज़्यादा अपनों की खुशियों और मान की चिंता होती है . अपनी हर तमन्ना पूरी कर लेने को हमारा दिल हमें उकसाता है ये सोचे और जाने बगैर कि हमारी एक छोटी सी ख्वाहिश हमारे अपनों की खुशियों का गला घोंट देगी . हमारा दिल एक बच्चे की तरह होता है जो हर अच्छी चीज़ की तमन्ना कर बैठता है और जब वो चीज़ हमारी पहुँच से दूर हो जाती है तो हमारे शरीर के इस छोटे से हिस्से को ऐसी चोट पहुँचती है कि लगता है उसके बिना हमारा पूरा जीवन ही व्यर्थ है . दूसरी ओर हमारा दिमाग कोई भी निर्णय लेने से पहले सौ बार ये सोचता है कि ये हमें और हमसे जुड़े लोगों को किस हद तक प्रभावित करेगा .
हममे से कुछ लोग अकसर इस गुत्थी में उलझे रहते हैं कि कोई भी फैसला दिल से लिया जाए या दिमाग से . बड़े-बूढ़े कह गए हैं फैसला चाहे दिल से किया जाए या फिर दिमाग से, अगर उससे हमारे अपनों को चोट पहुँचती है तो वह हरगिज़ सही नहीं है . जिस ख़ुशी में बड़ों की दुआएँ न हो वह ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक सकती . लेकिन इस नन्हें-मुन्ने से जिद्दी दिल को कैसे समझाएँ, क्योंकि दिल तो बच्चा है जी .
हममे से कुछ लोग अकसर इस गुत्थी में उलझे रहते हैं कि कोई भी फैसला दिल से लिया जाए या दिमाग से . बड़े-बूढ़े कह गए हैं फैसला चाहे दिल से किया जाए या फिर दिमाग से, अगर उससे हमारे अपनों को चोट पहुँचती है तो वह हरगिज़ सही नहीं है . जिस ख़ुशी में बड़ों की दुआएँ न हो वह ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक सकती . लेकिन इस नन्हें-मुन्ने से जिद्दी दिल को कैसे समझाएँ, क्योंकि दिल तो बच्चा है जी .
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