हम में से अकसर लोगों को ये कहते सुना होगा कि अगर हमारी किस्मत में होगा तो ज़रूर मिलेगा . क्या सचमुच हमारी किस्मत हमारी पूरी ज़िन्दगी का फैसला करती है ? क्या सचमुच हमारी पूरी ज़िन्दगी हमारे भाग्य पर निर्भर करती है ?
कभी - कभी हम जिस चीज़ को पाने का जी तोड़ प्रयास करते हैं वह चाह कर भी हमें नहीं मिलती . वहीँ कुछ चीज़ें बिना किसी मेह्नत के बिन मांगे ही ऊपर वाला हमारी झोली में डाल देता है . लेकिन हम इंसानों की फितरत ही ऐसी है कि जो चीज़ आसानी से बिना किसी प्रयास के हमें मिल जाती है उसका हमारी नज़र में कोई महत्व नहीं होता और जो चीज़ हमारी पहुँच से दूर होती है उसे पाने कि नाकाम कोशिश में हम अपना जी-जान लगा देते हैं . हजारों कोशिशों के बाद जब हम उसे पाने में असमर्थ हो जाते हैं तो यह कर हाथ झाड़ लेते हैं कि वह हमारी किस्मत में ही नहीं था .
आज हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहे हैं जहाँ लोग भाग्य में विश्वास न कर के अपनी मेह्नत और हिम्मत पर विश्वास करते हैं और अपनी किस्मत खुद लिखने का हौसला रखते हैं . अगर हम अपने इरादों में सफल हो गए तो उसे अपने अटूट हौसले और कठिन परिश्रम का नाम देते हैऔर अगर हम विफल हो गए तो अपने भाग्य का रोना रोते हैं . यदि हम जीवन की इस पहेली को सुलझा लें कि हमारे भाग्य कि लकीरों में क्या लिखा है और क्या नहीं तो हम अपना बहुमूल्य समय नष्ट होने से बचा सकते हैं .
यह देखा गया है कि लोग ठोकर खा कर ही सीखते हैं और वही लोग जीवन पथ पर अडिगता से चलते हुए सफलता कि डोर थामते हैं .इसी का नाम तो ज़िन्दगी है जो हर पल एक नया पाठ पढ़ाती है , जिसने इसे समझ लिया वह जीवन की परीक्षा में आसानी से पास हो गया और जिसने नहीं समझा वह यूँ ही दर-दर भटकता रहा .