रैगिंग का चलन ब्रिटिश काल से चला आ रहा है और अन्य व्याप्त पश्चिमी प्रथाओं की भांति इसे भी हमारे समाज ने बड़े ही गर्व से अपनाया है। आई0आई0टी0 , आई0आई0एम0 और मेडिकल काॅलेज ; से प्रारम्भ हुई इस प्रथा का चलन अब हर छोटे-बड़े विद्यालयो एंव विश्वविद्यालयों मे दिखाई पड़ता है।
सीनियर छात्र अधिक समय से हाॅस्टल मे रहने एंव परीवार व हर प्रकार के मनोरंजन से दूर रहने के कारण एकान्त एंव कुंठित महसूस करने लगते हैं। फ्रेशर छात्रों के आगमन से उनका दिल बल्लियों उछलने लगता है। अपने मनोरंजन के लिए उन्हें तरह-तरह से प्रताडि़त करना एक खेल समझ कर खेला जाने लगता है। बीच परीसर मे सब के सामने मुर्गा बनाना, कपड़े उतरवाना, भद्दा नाच, मुंह काला करना इत्यादी प्रकारों से फ्रेशर छात्रों को अपमानित करने मे उन्हें बड़ा मज़ा आता और वे इसे सीनियर का हक समझ कर करवाते है। आए दिन अखबार और न्यूज़ चैनल की सुर्खियों मे देखने को मिलता है कि छात्र/छात्रा ने सीनियर द्वारा रैगिंग के अपमानजनक कृत्य से क्षुब्ध हो कर आत्महत्या कर ली। वह नौजवान जो दिल मे हज़ारों उमंगे लिए इस इच्छा से काॅलेज मे प्रवेश लेता है कि वह पढ़-लिख अपना उज्जवल भविष्य बनाएगा, एक अच्छी नौकरी करेगा और अपने भाई-बहन व बूढ़े माॅ-बाप का सहारा बनेगा। उसने कभी सोचा भी न होगा कि यहां आकर उसे विवशतापूर्वक अपने जीवन की आहुती देनी पड़ेगी। कुछ सालो पहले आई हिन्दी सिनेमा की ब्लाकबस्टर फिल्म ‘थ्री ईडियट’ जिसमे हिन्दी सिनेमा के जाने-माने कलाकार आमिर खां, आर0 माधवन और शरमन जोशी ने अभिनय किया था। हालांकि यह फिल्म आज की शिक्षा व्यवस्था पर कटाक्ष करती है पर फिल्म के प्रारम्भ मे दिखाया गया है कि कैसे सीनियर छात्र काॅलेज मे प्रवेश लेने वाले नए छात्रों की रैगिंग करते हैं। जिसे फिल्म का एक हिस्सा और उस हिस्से को एक हास्य चित्रण के रूप मे प्रदर्शित किया गया है। रैगिंग के विषय पर सिनेमा मे कई फिलमे आई पर उसे समस्या न समझ कर केवल मनोरंजन के तौर पर लिया गया।
रैगिंग एक घनिष्ठ अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानून जुर्म करार दिया है और मुलजि़म के विरूद्ध सख्त सज़ा का प्रवाधान है। केन्द्र सरकार की निगरानी मे एक समिति का गठन किया गया है जिस पर ीमसचसपदम/ंदजपतंहहपदहण्पद के माध्यम से शिकायतकर्ता अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। साथ ही साथ विभिन्न शहरों मे अलग-अलग टाॅल फ्री हेल्पलाइन नम्बर भी उपलब्ध कराए गए हैं जिसके द्वारा शिकायतकर्ता सीधे पुलीस से सम्पर्क कर अपनी समस्या बता सकता है ।
इन सब के बावजूद विद्यालयों एंव विश्वविद्यालयों मे धड़ल्ले से रैगिंग हो रही है और अपनी पकड़ मज़बूत बनाए हुए है। दो पल के मनोरंजन के लिए दूसरों को अपमानजनक कार्य करने पर मजबूर करना जिससे सामने वाले के दिल-दिमाग मे हीनता व ग्लानी का एहसास इतना बढ़ जाए कि उसे आत्महत्या का एकमात्र रास्ता ही नज़र आए। इसे मनोरंजन नही एक भयावय जुर्म कहेंगे। मीडिया रैगिंग की केवल उन्हीं घटनाओं को तूल देता है जो अपराध की नौबत तक पहॅंुच चुकी हो परन्तु ऐसे कई छात्र हैं जो इस प्रकार के घृणित कार्यों से इतना अपमानित महसूस करने लगते हैं कि अस्वाद, दिमागी दौरा, डर, कुण्ठा जैसी भावनाओं से ग्रासित हो जाते हैं। पर ऐसे केस को न तो मीडिया प्रदर्षित/प्रकाशित करता है और न ही कानून कोई कदम उठाता है।
यह हर शैक्षणिक संस्थान की जि़म्मेदारी बनती है कि अपने यहां प्रवेश लेने वाने छात्रो को सुरक्षित एंव स्वतंत्र वातावरण मे शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्रदान करें। विद्यालयों एंव विश्वविद्यालयों मे यह आवश्यक हो गया है कि संस्था के प्राशासनिक स्तर पर एक ‘‘एण्टी रैगिंग सेल’’ का गठन किया जाए और सीनियर छात्रों पर पैनी नज़र रखी जाए। साथ ही साथ प्रवेश लेने वाले नए छात्रो की कक्षाओ और हाॅस्टल मे समय-समय पर जाकर रैगिंग के विषय मे जानकारी लेनी चाहिए।