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Monday, 22 July 2013

आज की दुर्गा व पार्वती

ये इक्कीसवीं सदी है जहाँ हर व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार है। 1947 के बाद आज़ाद भारत के संविधान में महिलाओं को हर वो अधिकार दिए गए जो पहले पुरषों की मिलकियत हुआ करते थे। कोई भी क्षेत्र हो चाहे शिक्षाए व्यावसाएए फिल्मए पॉलिटिक्सए अन्तरिक्षए विज्ञानं या अन्य कोई आज हर जगह महिलाएँ न केवल कदम से कदम मिला कर चल रहीं हैं बल्कि शीर्ष को छू रही हैं।

ये तो हुआ तस्वीर का एक पहलू जिससे हम और आप अवगत हैंए तस्वीर के दूसरी ओर क्या है इसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। अपनी आज़ादी और सामान अधिकार के नाम पर महिलाएँ कितना शोषित होतीं हैं ये उन्हें खुद नहीं पता। नौकरी पेशा महिलाओं को दिन 8.10 घंटे अपने कार्य स्थल पर जूझने के बाद अपनी घरेलू ज़िम्मेदारियों को भी उसी लगन व मेहनत से करना होता है। उसका एक पाँव ऑफिस में होता है तो दूसरा घर में। वह इस कोशिश में हलाकान होती रहती है कि दोनों जगह पर्याप्त सन्तुलन बनाएं और किसी को शिकायत का मौका न दे। दोनों ज़िम्मेदारी उठाते वह खुद को बहुत मज़बूत साबित करती है परन्तु वह अन्दर से बहुत टूट.फुट का शिकार होती रहती है। वह चाहे खेतों में करे या दफ्तरों मेंएपुरषों का बोझ बांटती है पर कितने प्रतिशत पुरुष होंगे जो घरेलू ज़िम्मेदारियों में उनका हाथ बटाते हैंएशायद 5ः भी नहीं। इन दोहरी जिम्मेदारियों के साथ साथ एक माँ बन कर अपने बच्चों की अच्छी परवरिश करना ए उनका मार्गदर्शन करना उसके लिए एक चुनौती से कम नहीं होता। 

नई चुनौतियाँए नई प्रतिस्पर्धा ये आज के समाज की मांग है। इस डर से कि कहीं हम किसी से पीछे न रह जाएँए हम अपनी जीवन शैली को तेज़ी से बदल रहें हैं। अच्छे से अच्छा जीवन जीने की होड़ में आज हम एक मशीन हो कर रह गये हैं। पर वास्तव में हम फिर भी संतुष्ट नही हैं। महिलाओं ने अपनी ख़ुशी से इस दोहरी ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया है ताकि वो आत्म.निर्भर बन सकें और अपने परिवार को सहारा दे सके। इस दौड़ती भागती ज़िन्दगी में वे शारीरिक रूप व मानसिक रूप से कमज़ोर होती जा रही हैं  पर आज की मांग को पूरा करने की होड़ में उसे ये सब करना पड़ रहा है ।  उसे एक अच्छी बेटीए बहनए पत्नी और माँ के साथ.साथ एक अच्छी बॉस व कर्मचारी का भी प्रमाण देना होता है। सलाम है उस नारी को जिसने अपने द्रड़ संकल्प से यह साबित कर दिया है कि वो पुरषों से कम नही वरन उनसे दुगुनी ज़िम्मेदारी उठाने में सक्षम है ।



Wednesday, 10 July 2013

देश के होनहार सपूत

 हाल ही में हुए पूर्वान्चल विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में हम सभी छात्र-छात्राओं ने राज्यपाल जी के पूछने पर बड़े फख्र से अपने विषयों व भविष्य की योजनाओं को साझा किया। मेरी तरह आज देश का हर युवा एक अच्छा कैरियर, परिवार व पैसे की कामना करता है और उसके लिए हर संभव प्रयास करता है। परन्तु यदि आपसे जीवन और कैरियर में से किसी एक को चुनने को कहा जाये तो आप किसे चुनेंगे ? शान-शौकत, रूतबा जितना ही बड़ा क्यों न हो, किसी की ज़िन्दगी से बड़ा नहीं हो सकता। परन्तु ये बात हमारे उन भाइयों पर आ कर रुक जाती है जो देश की सीमा रेखा पर खड़े हमारी और हमारे देश की सुरक्षा के लिए घंटों तैनात रहते हैं। जी हाँ मै बात कर रही हूँ उन फौजी भाइयों की जिन्होंने ने अपना ऐश-आराम छोड़ कर एक ऐसा जीवन को चुना जहाँ ज़िन्दगी मौत का कोई भरोसा नहीं होता। अपना आराम तज का, अपने परिवार को छोड़ कर एल.ओ.सी. (लाइन ऑफ़ कन्ट्रोल) पर तैनात दुश्मनों की गोलियों का सामना करते हैं और अपने देश की रक्षा के लिए शहीद हो जाते हैं।
आज की मतलब परस्त दुनिया में हर कोई अपने बारे में सोचता है , परन्तु आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो डॉकटर, मैनेजर,प्रोफेसर,इंजीनियर बनने की अपेक्षा फौजी बनने में फख्र करते हैं।बहुत जिगर वाले होते हैं वो माँ-बाप जो अपने लाडलों को देश की रक्षा के लिए सीमा-रेखा पर भेजते हैं। क्या गुज़रती होगी उन पर जब पड़ोसी देश से भेजी गयी अपने बेटे की सर कटी लाश को कन्धा देते होंगे। वो माएँ जो अपने बच्चों को उंगली पकड़ कर हर ऊँचे-नीचे रास्तों पर चलना सिखाती हैं वही अपने बेटों से मिलने के लिए उनकी राह तकते-तकते बूढ़ी हो जाती है। 
 विद्यालय स्तर पर शुरू की गयी एन.सी.सी. व एन.एस.एस. की योजनाएँ सराहनीय हैं परन्तु इसमें युवाओं की भागीदारी केवल 2 % - 5 % ही है। हमारी दुनिया मोबाइल व इन्टरनेट तक ही सीमित हो कर रह गयी है । आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे है, चैन की मीठी नींद सोते हैं उसका सारा श्रेय उन सेना के जवानों को जाता है। मौसम व गोलियों को परवाह किये बगैर ये उनके रतजगो का नतीजा है कि हम सुकून की हवा मे सांस ले रहें हैं। ज़रा सोचिये आज अगर वे न हो तो शायद हम किसी विदेशी आक्रमण का शिकार
 हो चुके होते। 
देश का हर युवक सेना में भर्ती  नहीं हो सकता और न ही होना चाहता है परन्तु हम अपने देश के लिए छोटे-मोटे योगदान तो कर ही सकते हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना, अपने आस-पास गन्दगी का ढेर न लगने देना, गरीबों व ज़रूरतमंदों की सहाएता करना, गलत बात का विरोध करना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जिनको अपने जीवन में लागू कर लें तो हमारा सामाजिक ढांचा ही बदल जाएगा और हमारे फौजी भाइयों की मेहनत व बलिदान भी व्यर्थ न जाये।

Tuesday, 9 July 2013

क्या आप के दिमाग में ज़ंग लग गया है

शोधकर्ताओं का कहना है कि, महान प्रतिभा के धनी एल्बर्ट आइन्स्टाइन अपने दिमाग का एक बहुत छोटा हिस्सा इस्तेमाल करते थे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आप अपने दिमाग का कितना या यूं कहें कि कितना कम हिस्सा इस्तेमाल में लाते हैं? दिमाग का सही प्रयोग न करने पर क्षीण वह  हो जाता है जितना आप अपने दिमाग का कम इस्तेमाल करेंगे उतना ही आप कमज़ोरी, दिमागी अव्यवस्थ, कमज़ोर याददाश्त जैसी समस्याओं से खुद को जकड़ा पाएँगे। हालिया खोज ने यह प्रमाणित कर दिया है कि शिक्षा और मस्तिष्क का लगातार इस्तेमाल हमें कई तरह की बीमारियों से संरक्षित करता है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ . रॉबर्ट काट्ज़मन ने यह दावा किया है कि अध्यन कार्य और शिक्षा हमारे मस्तिष्क को मंद होने से बचाता है और उस की कोशिकाओं को जीवित रखता है।

अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम नई-नई चुनौतियों का सामना करते हैं, जिसके चलते हमारा मस्तिष्क नई सूचनाओं को ग्रहण करता है और विकास प्रक्रिया की ओर अग्रसित होता है। हमारी बुद्धि की संरचना कुछ इस प्रकार है कि यदि उसका प्रयोग सही ढ़ंग से न किया जाये तो उसकी कार्य गति धीमी पड़ जाती है. उदाहरण के लिए, वैज्ञानिकों का कहना है कि आजकल के युवा कंप्यूटर एवं मोबाइल का लगातार इस्तेमाल करने की वजह से पेन-पेपर पर हिसाब व आकलन करने में असमर्थ हो गये हैं। जिसका कारण यह है कि दिमाग
का वह हिस्सा जो इस काम को अन्जाम देता है वह कमज़ोर हो गया है क्योंकि उसका उपयोग बंद कर दिया गया है।
टीवी स्क्रीन के सामने घंटो बैठे रहने से जहाँ आप का मस्तिष्क बिना किसी काम में आए केवल चलती फिरती इमेज अपने अन्दर उतारता रहता है जो हमारे दिमाग की कई महत्वपूर्ण कोशिकाओं को मार डालता है। कभी-कभी ये हमारे दिमाग पर नकारात्मक असर डालता है जो हमें असभ्यता और हिंसा की ओर अग्रसर करता है।
उम्र बढ़ने के साथ-साथ हमारा शरीर और मस्तिष्क धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगता है। जिस तरह हमारी मांसपेशियाँ उम्र के साथ साथ ढ़ीली पड़ जाती हैं उसी तरह हमारे मस्तिष्क की क्रियाशीलता भी धीरे-धीरे मद्धिम पड़ जाती है।
अधिकतर लोगअपनी शारीरिक व मानसिक क्षमताओं को नष्ट कर देते हैं। डाक्टरों व योगियों का कहना है कि नियमित रूप से व्यायाम न करने पर हमारी मांसपेशियों में जंग लग जाता है। या यूँ कहें कि उनमें लचीलापन खत्म हो जाता है और वे कठोर एवं सख्त हो जाती हैं, जिसकी वजह से जिसकी वजह से लोगों को लोगों को चलने फिरने में तकलीफ होती है। घुटनों में सूजन, कमर में दर्द आदि परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह से अगर दिमाग का इस्तेमाल न किया जाये तो उसमे भी जंग लग जाता है यानि कि वह धीरे-धीरे  काम करना बंद कर देता है। यदि आप चाहते हैं कि मानसिक रूप से हमेशा चुस्त-दुरुस्त रहें तो ज्ञानवर्धक किताबों का अध्यन करें, ऐसे टीवी चैनल्स देखें जो आपके ज्ञान को बढ़ावा देते हैं और साथ ही साथ आप चेस जैसे खेल भी खेल कर अपनी बुद्धि का विकास कर सकते हैं।