ये इक्कीसवीं सदी है जहाँ हर व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार है। 1947 के बाद आज़ाद भारत के संविधान में महिलाओं को हर वो अधिकार दिए गए जो पहले पुरषों की मिलकियत हुआ करते थे। कोई भी क्षेत्र हो चाहे शिक्षाए व्यावसाएए फिल्मए पॉलिटिक्सए अन्तरिक्षए विज्ञानं या अन्य कोई आज हर जगह महिलाएँ न केवल कदम से कदम मिला कर चल रहीं हैं बल्कि शीर्ष को छू रही हैं।
ये तो हुआ तस्वीर का एक पहलू जिससे हम और आप अवगत हैंए तस्वीर के दूसरी ओर क्या है इसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। अपनी आज़ादी और सामान अधिकार के नाम पर महिलाएँ कितना शोषित होतीं हैं ये उन्हें खुद नहीं पता। नौकरी पेशा महिलाओं को दिन 8.10 घंटे अपने कार्य स्थल पर जूझने के बाद अपनी घरेलू ज़िम्मेदारियों को भी उसी लगन व मेहनत से करना होता है। उसका एक पाँव ऑफिस में होता है तो दूसरा घर में। वह इस कोशिश में हलाकान होती रहती है कि दोनों जगह पर्याप्त सन्तुलन बनाएं और किसी को शिकायत का मौका न दे। दोनों ज़िम्मेदारी उठाते वह खुद को बहुत मज़बूत साबित करती है परन्तु वह अन्दर से बहुत टूट.फुट का शिकार होती रहती है। वह चाहे खेतों में करे या दफ्तरों मेंएपुरषों का बोझ बांटती है पर कितने प्रतिशत पुरुष होंगे जो घरेलू ज़िम्मेदारियों में उनका हाथ बटाते हैंएशायद 5ः भी नहीं। इन दोहरी जिम्मेदारियों के साथ साथ एक माँ बन कर अपने बच्चों की अच्छी परवरिश करना ए उनका मार्गदर्शन करना उसके लिए एक चुनौती से कम नहीं होता।
नई चुनौतियाँए नई प्रतिस्पर्धा ये आज के समाज की मांग है। इस डर से कि कहीं हम किसी से पीछे न रह जाएँए हम अपनी जीवन शैली को तेज़ी से बदल रहें हैं। अच्छे से अच्छा जीवन जीने की होड़ में आज हम एक मशीन हो कर रह गये हैं। पर वास्तव में हम फिर भी संतुष्ट नही हैं। महिलाओं ने अपनी ख़ुशी से इस दोहरी ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया है ताकि वो आत्म.निर्भर बन सकें और अपने परिवार को सहारा दे सके। इस दौड़ती भागती ज़िन्दगी में वे शारीरिक रूप व मानसिक रूप से कमज़ोर होती जा रही हैं पर आज की मांग को पूरा करने की होड़ में उसे ये सब करना पड़ रहा है । उसे एक अच्छी बेटीए बहनए पत्नी और माँ के साथ.साथ एक अच्छी बॉस व कर्मचारी का भी प्रमाण देना होता है। सलाम है उस नारी को जिसने अपने द्रड़ संकल्प से यह साबित कर दिया है कि वो पुरषों से कम नही वरन उनसे दुगुनी ज़िम्मेदारी उठाने में सक्षम है ।
ये तो हुआ तस्वीर का एक पहलू जिससे हम और आप अवगत हैंए तस्वीर के दूसरी ओर क्या है इसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। अपनी आज़ादी और सामान अधिकार के नाम पर महिलाएँ कितना शोषित होतीं हैं ये उन्हें खुद नहीं पता। नौकरी पेशा महिलाओं को दिन 8.10 घंटे अपने कार्य स्थल पर जूझने के बाद अपनी घरेलू ज़िम्मेदारियों को भी उसी लगन व मेहनत से करना होता है। उसका एक पाँव ऑफिस में होता है तो दूसरा घर में। वह इस कोशिश में हलाकान होती रहती है कि दोनों जगह पर्याप्त सन्तुलन बनाएं और किसी को शिकायत का मौका न दे। दोनों ज़िम्मेदारी उठाते वह खुद को बहुत मज़बूत साबित करती है परन्तु वह अन्दर से बहुत टूट.फुट का शिकार होती रहती है। वह चाहे खेतों में करे या दफ्तरों मेंएपुरषों का बोझ बांटती है पर कितने प्रतिशत पुरुष होंगे जो घरेलू ज़िम्मेदारियों में उनका हाथ बटाते हैंएशायद 5ः भी नहीं। इन दोहरी जिम्मेदारियों के साथ साथ एक माँ बन कर अपने बच्चों की अच्छी परवरिश करना ए उनका मार्गदर्शन करना उसके लिए एक चुनौती से कम नहीं होता।
नई चुनौतियाँए नई प्रतिस्पर्धा ये आज के समाज की मांग है। इस डर से कि कहीं हम किसी से पीछे न रह जाएँए हम अपनी जीवन शैली को तेज़ी से बदल रहें हैं। अच्छे से अच्छा जीवन जीने की होड़ में आज हम एक मशीन हो कर रह गये हैं। पर वास्तव में हम फिर भी संतुष्ट नही हैं। महिलाओं ने अपनी ख़ुशी से इस दोहरी ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाया है ताकि वो आत्म.निर्भर बन सकें और अपने परिवार को सहारा दे सके। इस दौड़ती भागती ज़िन्दगी में वे शारीरिक रूप व मानसिक रूप से कमज़ोर होती जा रही हैं पर आज की मांग को पूरा करने की होड़ में उसे ये सब करना पड़ रहा है । उसे एक अच्छी बेटीए बहनए पत्नी और माँ के साथ.साथ एक अच्छी बॉस व कर्मचारी का भी प्रमाण देना होता है। सलाम है उस नारी को जिसने अपने द्रड़ संकल्प से यह साबित कर दिया है कि वो पुरषों से कम नही वरन उनसे दुगुनी ज़िम्मेदारी उठाने में सक्षम है ।
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