हाल ही में हुए पूर्वान्चल विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में हम
सभी छात्र-छात्राओं ने राज्यपाल जी के पूछने पर बड़े फख्र से अपने विषयों व
भविष्य की योजनाओं को साझा किया। मेरी तरह आज देश का हर युवा एक अच्छा
कैरियर, परिवार व पैसे की कामना करता है और उसके लिए हर संभव प्रयास करता
है। परन्तु यदि आपसे जीवन और कैरियर में से किसी एक को चुनने को कहा जाये
तो आप किसे चुनेंगे ? शान-शौकत, रूतबा जितना ही बड़ा क्यों न हो, किसी की
ज़िन्दगी से बड़ा नहीं हो सकता। परन्तु ये बात हमारे उन भाइयों पर आ कर रुक
जाती है जो देश की सीमा रेखा पर खड़े हमारी और हमारे देश की सुरक्षा के लिए
घंटों तैनात रहते हैं। जी हाँ मै बात कर रही हूँ उन फौजी भाइयों की
जिन्होंने ने अपना ऐश-आराम छोड़ कर एक ऐसा जीवन को चुना जहाँ ज़िन्दगी मौत का
कोई भरोसा नहीं होता। अपना आराम तज का, अपने परिवार को छोड़ कर एल.ओ.सी.
(लाइन ऑफ़ कन्ट्रोल) पर तैनात दुश्मनों की गोलियों का सामना करते हैं और
अपने देश की रक्षा के लिए शहीद हो जाते हैं।
आज की मतलब परस्त दुनिया में हर कोई अपने बारे में सोचता है , परन्तु आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो डॉकटर, मैनेजर,प्रोफेसर,इंजीनियर बनने की अपेक्षा फौजी बनने में फख्र करते हैं।बहुत जिगर वाले होते हैं वो माँ-बाप जो अपने लाडलों को देश की रक्षा के लिए सीमा-रेखा पर भेजते हैं। क्या गुज़रती होगी उन पर जब पड़ोसी देश से भेजी गयी अपने बेटे की सर कटी लाश को कन्धा देते होंगे। वो माएँ जो अपने बच्चों को उंगली पकड़ कर हर ऊँचे-नीचे रास्तों पर चलना सिखाती हैं वही अपने बेटों से मिलने के लिए उनकी राह तकते-तकते बूढ़ी हो जाती है।
विद्यालय स्तर पर शुरू की गयी एन.सी.सी. व एन.एस.एस. की योजनाएँ सराहनीय हैं परन्तु इसमें युवाओं की भागीदारी केवल 2 % - 5 % ही है। हमारी दुनिया मोबाइल व इन्टरनेट तक ही सीमित हो कर रह गयी है । आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे है, चैन की मीठी नींद सोते हैं उसका सारा श्रेय उन सेना के जवानों को जाता है। मौसम व गोलियों को परवाह किये बगैर ये उनके रतजगो का नतीजा है कि हम सुकून की हवा मे सांस ले रहें हैं। ज़रा सोचिये आज अगर वे न हो तो शायद हम किसी विदेशी आक्रमण का शिकार
हो चुके होते।
देश का हर युवक सेना में भर्ती नहीं हो सकता और न ही होना चाहता है परन्तु हम अपने देश के लिए छोटे-मोटे योगदान तो कर ही सकते हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना, अपने आस-पास गन्दगी का ढेर न लगने देना, गरीबों व ज़रूरतमंदों की सहाएता करना, गलत बात का विरोध करना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जिनको अपने जीवन में लागू कर लें तो हमारा सामाजिक ढांचा ही बदल जाएगा और हमारे फौजी भाइयों की मेहनत व बलिदान भी व्यर्थ न जाये।
आज की मतलब परस्त दुनिया में हर कोई अपने बारे में सोचता है , परन्तु आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो डॉकटर, मैनेजर,प्रोफेसर,इंजीनियर बनने की अपेक्षा फौजी बनने में फख्र करते हैं।बहुत जिगर वाले होते हैं वो माँ-बाप जो अपने लाडलों को देश की रक्षा के लिए सीमा-रेखा पर भेजते हैं। क्या गुज़रती होगी उन पर जब पड़ोसी देश से भेजी गयी अपने बेटे की सर कटी लाश को कन्धा देते होंगे। वो माएँ जो अपने बच्चों को उंगली पकड़ कर हर ऊँचे-नीचे रास्तों पर चलना सिखाती हैं वही अपने बेटों से मिलने के लिए उनकी राह तकते-तकते बूढ़ी हो जाती है।
विद्यालय स्तर पर शुरू की गयी एन.सी.सी. व एन.एस.एस. की योजनाएँ सराहनीय हैं परन्तु इसमें युवाओं की भागीदारी केवल 2 % - 5 % ही है। हमारी दुनिया मोबाइल व इन्टरनेट तक ही सीमित हो कर रह गयी है । आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे है, चैन की मीठी नींद सोते हैं उसका सारा श्रेय उन सेना के जवानों को जाता है। मौसम व गोलियों को परवाह किये बगैर ये उनके रतजगो का नतीजा है कि हम सुकून की हवा मे सांस ले रहें हैं। ज़रा सोचिये आज अगर वे न हो तो शायद हम किसी विदेशी आक्रमण का शिकार
हो चुके होते।
देश का हर युवक सेना में भर्ती नहीं हो सकता और न ही होना चाहता है परन्तु हम अपने देश के लिए छोटे-मोटे योगदान तो कर ही सकते हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना, अपने आस-पास गन्दगी का ढेर न लगने देना, गरीबों व ज़रूरतमंदों की सहाएता करना, गलत बात का विरोध करना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जिनको अपने जीवन में लागू कर लें तो हमारा सामाजिक ढांचा ही बदल जाएगा और हमारे फौजी भाइयों की मेहनत व बलिदान भी व्यर्थ न जाये।
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