कहते हैं हर सफल पुरुष की सफलता के पीछे एक महिला का हाथ होता है . कभी माँ के रूप में , कभी पत्नी , कभी बहन या कभी एक दोस्त के रूप में वह हर पल उसका हौसला बढाती है और हर मुश्किल हालात में उसका साथ देती है . लेकिन एक महिला के लिए अपनी मंजिल तक पहुँचना आसान नहीं होता . हमारे समाज की खोखली परम्पराएँ और कुप्रथाएँ चट्टान की तरह उसका रास्ता रोके खड़ी रहती हैं .
कहने को तो हमारा देश बहुत तरक्की कर चुका है जहाँ लड़का - लड़की के समान अधिकार की बात कही जाती है पर आज आज़ादी के 65 साल बाद भी महिलाओं की स्थिति में नाममात्र ही बदलाव आया है . माता - पिता लड़कियों को शिक्षा दिलाने में तो कोई संकोच नहीं करते लेकिन पढाई के दौरान या पूरी होते ही वे इस उधेड़बुन में लग जाते हैं कि उसके लिए अच्छे से अच्छा वर तलाश किया जाए , ये जाने और सोचे बगैर कि इस तरह वे अपनी लाडली की आँखों में बरसों से सजे ख्वाब को बेदर्दी से नोच कर फ़ेंक देते हैं जिनको अब हकीकत का रूप मिलने वाला था . वे अपनी जगह गलत भी नहीं होते बस चाहते हैं कि जल्द से जल्द अपने फ़र्ज़ से बरी हो जाएँ . हर व्यक्ति चाहे वह लड़का हो या लड़की अपने उज्जवल भविष्य की कामना तब से करने लगता है जब वह स्कूल में अपना पसंदीदा विषय चुनता है . आज का युवा अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है . प्रतिस्पर्धा की इस लम्बी दौड़ में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता है . जब नौकरी की बात आती है तो लड़कियों को समाज का ही नही बल्कि अपने घर वालों का ही समर्थन नहीं मिलता . उन्हें यह कह कर घर में बिठा दिया जाता है कि लोग क्या कहेंगे.., रिश्तेदार क्या कहेंगे.. . मुस्लिम महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है . माता - पिता ये समझ कर भी नहीं समझते कि आज की मतलब-परस्त दुनियाँ में कोई किसी को खुद से आगे नहीं देखना चाहता इसलिए हर कोई सामने वाले का मनोबल तोड़ने में लगा रहता है . महिलाएं अगर समाज की परवाह करना छोड़ दें तो उनके लिए कुछ भी पाना मुश्किल नहीं .
कभी परिवार तो कभी समाज की दकियानूसी रीति-रिवाजों के नाम पर महिलाओं की प्रतिभा का गला घोंटा जा रहा है , जबकि सभी को अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी मंजिल पाने का अधिकार है . हमारा देश आज भी पश्चिमी देशों के मुकाबले इतना पिछड़ा हुआ इसलिए है क्योंकि यहाँ कुछ महानगरों को छोड़ कर छोटे - बड़े शहरों में महिलाओं को पुरषों जितना अधिकार और आज़ादी नहीं है . वे चाह कर भी दुनिया से कदम से कदम मिला कर नहीं चल सकती और न ही अपनी मर्ज़ी से अपना प्रोफेशन चुन सकती हैं . इस वजह से हमारी राष्ट्रिय आय में महिलाओं की सहभागिता बहुत कम है , जबकि पश्चिमी देश इस मामले में हमसे बहुत आगे है क्योंकि महिला और पुरुष बिना किसी अंतर के पूरी आज़ादी से अपना भविष्य चुनते हैं .
कहा जाता है , बुलंद हौसला और खुद पर अटूट विश्वास हो तो मंजिल पाना मुश्किल नहीं , लेकिन हमारे यहाँ महिलाओं के लिए अपनी महत्वकान्छओं से ज्यादा अपनों के मान का पास रखना ज़रूरी होता है . आखिर कब तब तक महिलाओं को अपनी ख्वाहिशों और चाहतों का गला घोटना पड़ेगा ? कब तक उसे लोगों से दब कर एक कठपुतली की तरह इशारों पर नाचना होगा ? कब तक उसे सामाजिक रीति-रिवाज़ और दकियानूसी परम्पराओं की आग में झुलसना होगा ?आखिर कब तक...............???
कहने को तो हमारा देश बहुत तरक्की कर चुका है जहाँ लड़का - लड़की के समान अधिकार की बात कही जाती है पर आज आज़ादी के 65 साल बाद भी महिलाओं की स्थिति में नाममात्र ही बदलाव आया है . माता - पिता लड़कियों को शिक्षा दिलाने में तो कोई संकोच नहीं करते लेकिन पढाई के दौरान या पूरी होते ही वे इस उधेड़बुन में लग जाते हैं कि उसके लिए अच्छे से अच्छा वर तलाश किया जाए , ये जाने और सोचे बगैर कि इस तरह वे अपनी लाडली की आँखों में बरसों से सजे ख्वाब को बेदर्दी से नोच कर फ़ेंक देते हैं जिनको अब हकीकत का रूप मिलने वाला था . वे अपनी जगह गलत भी नहीं होते बस चाहते हैं कि जल्द से जल्द अपने फ़र्ज़ से बरी हो जाएँ . हर व्यक्ति चाहे वह लड़का हो या लड़की अपने उज्जवल भविष्य की कामना तब से करने लगता है जब वह स्कूल में अपना पसंदीदा विषय चुनता है . आज का युवा अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है . प्रतिस्पर्धा की इस लम्बी दौड़ में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता है . जब नौकरी की बात आती है तो लड़कियों को समाज का ही नही बल्कि अपने घर वालों का ही समर्थन नहीं मिलता . उन्हें यह कह कर घर में बिठा दिया जाता है कि लोग क्या कहेंगे.., रिश्तेदार क्या कहेंगे.. . मुस्लिम महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है . माता - पिता ये समझ कर भी नहीं समझते कि आज की मतलब-परस्त दुनियाँ में कोई किसी को खुद से आगे नहीं देखना चाहता इसलिए हर कोई सामने वाले का मनोबल तोड़ने में लगा रहता है . महिलाएं अगर समाज की परवाह करना छोड़ दें तो उनके लिए कुछ भी पाना मुश्किल नहीं .
कभी परिवार तो कभी समाज की दकियानूसी रीति-रिवाजों के नाम पर महिलाओं की प्रतिभा का गला घोंटा जा रहा है , जबकि सभी को अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी मंजिल पाने का अधिकार है . हमारा देश आज भी पश्चिमी देशों के मुकाबले इतना पिछड़ा हुआ इसलिए है क्योंकि यहाँ कुछ महानगरों को छोड़ कर छोटे - बड़े शहरों में महिलाओं को पुरषों जितना अधिकार और आज़ादी नहीं है . वे चाह कर भी दुनिया से कदम से कदम मिला कर नहीं चल सकती और न ही अपनी मर्ज़ी से अपना प्रोफेशन चुन सकती हैं . इस वजह से हमारी राष्ट्रिय आय में महिलाओं की सहभागिता बहुत कम है , जबकि पश्चिमी देश इस मामले में हमसे बहुत आगे है क्योंकि महिला और पुरुष बिना किसी अंतर के पूरी आज़ादी से अपना भविष्य चुनते हैं .
कहा जाता है , बुलंद हौसला और खुद पर अटूट विश्वास हो तो मंजिल पाना मुश्किल नहीं , लेकिन हमारे यहाँ महिलाओं के लिए अपनी महत्वकान्छओं से ज्यादा अपनों के मान का पास रखना ज़रूरी होता है . आखिर कब तब तक महिलाओं को अपनी ख्वाहिशों और चाहतों का गला घोटना पड़ेगा ? कब तक उसे लोगों से दब कर एक कठपुतली की तरह इशारों पर नाचना होगा ? कब तक उसे सामाजिक रीति-रिवाज़ और दकियानूसी परम्पराओं की आग में झुलसना होगा ?आखिर कब तक...............???
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