चुनावी सरगर्मियाँ ज़ोरों पर है। देश के प्रत्येक क्षेत्र एवं कस्बों मे मतदान प्रकिया निरन्तर जारी है। सभी पार्टियों ने चुनावी प्रचार-प्रसार मे कोई कसर नहीं छोड़ी है। विभिन्न शहरों मे आयोजित रैलियों में बोले गए अपने भाषणों मे कोई मंहगाई व गरीबी खत्म करने की बात कर रहा तो कोई भ्रष्टाचार के साथ-साथ भ्रष्ट नेताओं और पूँजीपतियों को झाड़ू से किनारे लगाने का संकल्प ले रहा है। प्रत्येक टी0वी0 चैनलों व अखबारों के द्वारा अपना गुणगान करने वाली विभिन्न पार्टियों की छवि से जनता पूर्ण रूप से अवगत हो चुकी है। पहले की अपेक्षा अब देश का प्रत्येक नागरिक अपने मताधिकार के प्रति जागरूक हो चुका है। देश की 80 प्रतिशत जनता मतदान बूथ जा कर अपने मनपसन्द प्रत्याशी को वोट देती है।
हमारे देश मे पसन्द का प्रत्याशी से तात्यपर्य यह नहीं लगाया जाता कि वह जनता की अपेक्षाओं पर पूरा उतरे,, गरीबों का उत्थान करे,, समाज का विकास करे इत्यादि परन्तु इसके ठीक उलट भारत की 50-60 प्रतिशत जनता अपनी जाति-धर्म से खड़े उम्मीदवार को चुनती है। जब सरकार जनता की उम्मीदों पर पूरी नहीं उतरती तब हम चयनित नेता को दोष देते है परन्तु हम यह क्यों भूल जाते है कि भारी मतों से जिता कर हमने ही तो उन्हें कुर्सी तक पहुँचाया है। हम मीडिया के सामने नारा लगाते है कि ‘‘भ्रष्टाचार हटाओ, भ्रष्ट नेताओं को हटाओं’’ परन्तु इन्हें भ्रष्ट बनाने वाले हममे ही से कुछ लोग है। हमारे देश मे प्रतिभा की कमी नहीं है। बड़े-बड़े पूँजीपति जिन्हें हमारे युवा अपना प्रेरणा स्त्रोत मानते है, वे धरती से आकाश तक कैसे पहुँचे उसका खुलासा आए दिन अखबारों और टी0वी0 चैनलों मे होता रहता है। वे अपनी प्रतिभा का उपयोग कुछ इस प्रकार करते है- गरीब-मज़दूर किसानो की ज़मीन हड़प कर पावर-प्लान्ट खड़ा करने की सरकार से अनुमति, शराबखाने, माॅल व निजी कम्पनियों का लाईसेन्स प्राप्त करना, उपजाऊ ज़मीन पर फैक्ट्री बनवाना इत्यादि। व्यापारियों एवं कारोबारियों ने व्यावसायीकरण का गलत लाभ उठाया है। इनका सरकार से गठबन्धन होता है। सरकार इन्हे हर गैर कानूनी कार्य की अनुमति देती है और ये अपने मुनाफे का कुछ प्रतिशत सत्ताधारियों को देते है। बड़े-बड़े नेताओं की संध्या की चाय इन व्यापारियों के मेहमानखानों मे होती है। इनका एजेण्डा एक-दूसरे को आर्थिक लाभ पहुँचाना होता है। इनके आपसी मुनाफे से जनता को किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है इससे इन्हें कोई सरोकार नहीं।
आज हर आदमी बढ़ती मंहगाई की मार झेल रहा है। देश की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की दर मे न के बराबर वृद्धि हो रही है। वृद्धि की बात करे तो पिछले दो दशको मे देश मे भ्रष्टाचार और अपराधिक गतिविधियों मे निरन्तर वृद्धि हो रही है। अपराधियों के भीतर सरकार का भय समाप्त हो चुका है। बड़े से बड़ा अपराध करने के उपरान्त दोषी जुर्माने या बेल पर छूट जाता है और यदि जनता की ओर से दबाव बढ़ता है तो 2-5 साल की सज़्ाा दे कर अपराधी को रिहा कर दिया जाता है। दोषी यही सोचता है कि जब देश की सरकार ही बड़े से बड़े घोटाले मे लिप्त है तो हमारे छोटे-मोटे जुर्म करने से क्या बिगड़ जाएगा। अभियुक्त को यह लगता है कि जितना मुनाफा कमाना है कमा लो, यदि पकड़े भी गए तो भ्रष्ट नेताओं की तिजोरी भर कर रिहा हो जाएगें।
स्वतंत्र भारत में यही क्रम 1952 से सतत् चला आ रहा। हम मतदान के समय विधिवत विचार नहीं करते और बिना सोचे-समझे किसी भी प्रत्याशी को वोट दे कर विजयी बनाते हैं। देश की जनता को चाहिए कि वे अपने मत का मूल्य समझे और पूर्ण विचार के बाद अपने मत का सही प्रयोग करें । मतदाता अधिकार के चलते इस बार संसदीय चुनाव प्रक्रिया मे ‘‘नोटा’’ ;छव्ज्।.छवदम व् िज्ीम ।इवअमद्ध का प्रयोग प्रारम्भ किया गया है। इसके अधीन यदि मतदान सूची मे कोई भी प्रत्याशी आप की उम्मीदों पर पूरा नहीं उतरता तो आप ‘‘नोटा’’ बटन दबा सकते है जिसका आश्य यह होगा कि आपने ऊपर की सूची मे दिए गए किसी भी प्रत्याशी को नहीं चुना है।
किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता को यह अधिकार देती है कि वह निर्वाचन के द्वारा विभिन्न पार्टियों से खड़े उम्मीदवारों का चयन करें और योग्य एवं उचित प्रत्याशी को वोट दे। एक स्वच्छ एवं स्वस्थ निर्वाचन का तरीका यह है कि हमे जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और कुनबे के आधार पर नहीं वरन् पार्टी की अच्छी छवि और जनता व पूर्ण देश के विकास के लिए उसका समर्पण और बेहतर कार्यों के आधार पर वोट देना चाहिए। चूँकि भारत की 75 प्रतिशत आबादी युवा है इसलिए युवाओं का एक-एक मतदान अमूल्य सिद्ध होगा। यदि वे आने वाले दिनो मे अपना उज्जवल भविष्य एवं क्षेष्ठतर जीवन की कामना करते है और आने वाली पीढ़ी को एक विकसित भारत मे सांस लेने का सुख प्रदान करना चाहते है तो उन्हें अपने मताधिकार को बखूबी समझना और उसका उचित प्रयोग करना होगा।
यदि हम दृष्टि डालें ता ज्ञात होगा कि हमसे पीछे आज़ादी प्राप्त करने वाले देश अपने अच्छे और ईमानदार नेतृत्व के चलते आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य, चिकित्सा, कृषि आदि मामलों मे हमसे बहुत आगे निकल चुके हैं। वहीं हमारी आर्थिक दशा दिन प्रति दिन बद से बदतर होती ता रही है। हम आम जनता की बुनियादी आवश्यकताओं को ही पूरा नहीं का पा रहे है तो उनके विकास की बात करना तो अर्थहीन है। निर्वाचन मे चुने गए लोग पूँजीपतियों की कठपुतली बन जाते है। वे केवल भारत की उन 5 प्रतिशत जनता को लाभ पहुँचाने और उनके व्यवसाय को शीर्ष तक पहुँचाने मे अपना सम्पूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं जिनका घर पहले ही बड़ी-बड़ी तिजोरियों से भरा है। यह सब होता है हमारे मतों द्वारा अविवेकपूर्ण ढ़ंग से चुने गए सांसद व विधायक के कारण। निर्वाचन परिणाम के बाद यह देखने को मिलता है कि जिन प्रत्याशियों के ऊपर अपहरण, बलात्कार, डकैती जैसे मामले चल रहें है उन्हे जनता भारी मतों से विजयी बनाती हैं। इन नेताओं को वोट मिलता है अपने धर्म, जाति व बिरादरी के लागों से और उनसे जिन्हें वे प्रचार-प्रसार के दौरान भारी रकम या कीमती वस्तु घूस के रूप मे दे कर अपनी ओर कर लेते है। या यूँ कहें जनता अपना अमूल्य वोट लालच के कारण इन भ्रष्ट नेताओं का बेच देती है। यह अवधारणा इसलिए इतनी तेज़ी से फैल रही है क्योंकि अब भारतीयों मे ‘‘हम’’ से परे ‘‘मैं’’ वाली सोच हावी हो गई है। देश का भविष्य क्या होगा इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। निर्वाचन आयोग ने ऐसे प्रत्याशियों को टिकट देने से सख्ती से मना किया है जिन पर किसी प्रकार की रिपोर्ट दर्ज हो या मुकदमे चल रहे हों। पर कोई भी पार्टी इन नियमों का पालन नहीं कर रही और ऐसे दोषियों को अपने प्रतिनिधि के रूप में खड़ा कर रही है। अब यह हमारा कर्तव्य बनता है कि साफ छवि वाले प्रत्याशियों को अपना अमूल्य मत दें और लोकतंत्र का सही अर्थों मे लाभ उठाऐं।
भारतीय लोकतंत्र के चारो स्तम्भ न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस सभी मे घुन लग गया है। सब के सब केवल अपने लाभ के लिए भ्रष्ट नीति अपनाए हुए हैं। इस निर्वाचन मतदाताओं को देश की दुर्दशा के जि़म्मेदार इन नेताओं को सबक सिखाते हुए एक अच्छा प्रदर्शन करना होगा ताकि देश का भविष्य उज्जवल बन सके। मतदान करना केवल हमारा अधिकार नहीं वरन् कर्तव्य भी है। अतः प्रत्येक नागरिक को देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पूर्ण रूप से निर्वहन करना होगा। ज़रूरत है देश को एक नयी दिशा की ओर ले जाने की। युवा भारत का कर्तव्य केवल नारा लगाना की नहीं बल्कि देश को विकसित, भ्रष्टाचार मुक्त, गरीबी मुक्त देश बनाने का है। एक ऐसा देश जहाँ नेता-मंत्री अपने लाभ के लिए नहीं, जनता के लाभ के लिए समर्पित हों। इसलिए बहुत सोच-समझ कर अपना नेता चुनें क्योंकि आपका एक गलत वोट किसी भ्रष्ट को देश का कर्ता-धर्ता बना सकता है।
No comments:
Post a Comment