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Thursday, 19 December 2013

सात दिनों में गोरापन वरना पैसे वापस


‘‘सात दिनों मे गोरापन वरना पैसे वापस’’। कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि मै अपनी किसी क्रीम का विज्ञापन कर रही हूँ। फिलहाल तो नहीं पर यदि अखबार या टी0वी0 पर गोरी और खूबसूरत माॅडल के साथ किसी सौन्दर्य प्रसाधन का यह विज्ञापन इन्हीं पक्तियों मे किया जाए तो लाखो की संख्या मे उपभोकता मिल जाऐंगे। जैसे लोगों को पीलिया होता है वैसे ही आजकल ‘सफेदिया होने लगा है। गोरा-सफेद रंग पाने की प्रबल इच्छा लोगो मे इतनी बढ़ गई है कि हज़ारों की क्रीम लगाने से भी चैन नहीं मिलता तो प्लास्टिक सर्जरी का रूख करते हैं। खूबसूरती को गोरी रंगत से जोड़ कर देखा जाने लगा है। बड़े शहरों से होते होते यह बीमारी अब छोटे शहरों मे भी धावा बोलने लगी है। आश्चर्य करने वाली बात यह है कि इसके मरीज़ केवल युवा लड़कियाँ ही नही बल्कि युवा लड़के, बच्चे और 40-50 साल के व्यवसक भी इसमे शामिल है। गोरी, मुलायम और जवान त्वचा एंव खूबसूरत दिखने की ललक लड़को मे उतनी ही पाई जाने लगी है जितनी कभी लड़कियों मे होती थी। लड़कियो के सोलह क्षृंगार से दो कदम आगे लड़को के अठ्ठारह क्षृंगार होने लगे हैं



हमारे शरीर मे मेलेनिन नामक एक तत्व पाया जात है जो यह तय करता है कि हमारी त्वचा का रंग कैसा होगा। इसकी मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के शरीर मे अलग-अलग होती है। जितना अधिक मेलेनिन होगा त्वचा उतनी ही सांवली होगी। इस तत्व का शरीर मे पाया जाना इस बात पर निर्भर करत है कि वातावरण का तापमान क्या है। वह देश जो पृथ्वी के भूमध्यरेखा से दूर उँचे अक्षांस पर स्थित होने के कारण सूर्य की हल्की तीव्रता के सम्पर्क मे आते है वहाँ का तापमान न्युनतम होता  और अधिक ठंड होती है। इस वजह से वहाँ के लोगों की त्वचा मे मेलेनिन की मात्रा बहुत कम होती है और उनका शरीर सफेद नज़र आता है। वही अफ्रीका, जि़मबाॅम्बे और उसके आस पास के देश जो कि पृथ्वी के भूमध्यरेखा पर स्थित होने के कारण सूर्य की सीधी रौशनी के सम्पक मे आते है। परीणामस्वरूप वहाँ का ताप बहुत अधिक होता जिस के कारण वहा के लोग काले होते है चूँकि उनके शरीर मे मेलेनिन अत्याधिक मात्रा मे पाया जाता है। वहीं हमारा देश भूमध्यरेखा और उत्तरी अक्षांस के मध्य स्थ्ति होने के कारण यहाँ का तापमान घटता बड़ता रहता है इसलिए यहाँ गोरे, काले, सांवले हर तरह के लोग नज़र आते है पर अधिकतर बीच का गेहुँआ रंग ही यहाँ के लोगों की पहचान है।

प््राकृतिक रूप से यह हमारे वातावरण और शरीर की बनावट पर निर्भर करता है कि हमारी त्वचा का रंग कैसा होगा। बाहरी तत्वो को चेहरे पर मलने से शरीर के भीतर पाए जाने वाले तत्वो पर कोई असर नहीं होता। वक्ती तौर आप का चेहरा साफ नज़र आने लगता है परन्तु शरीर मे मेलेनिन की मात्रा घटती-बढ़ती नहीं ह। इसलिए उत्पाद का इस्तेमाल बन्द करने की दशा मे आप फिर से अपने पहले वाले रंग रूप मे नज़र आने लगेंगे। इन सौन्दर्य प्रसाधनो मे एक प्रकार का उपसक ंसबवीवसपब ंबपक मिलाया जाता है जो आपको कुछ दिनो के लिए गोरा तो कर देता है परन्तु त्वचा को बहुत नुकसान पहुँचाता है। त्वचा का रूखा-बेजान नज़र आना, मुहाँसे, जलन, समय से पहले झुर्रियाँ आदि इसके हानिकारक लक्षण होते हैं जिनसे अकसर महिलाएँ जूझती नज़र आती है।


आज कल टी0वी0 पर दिखाऐ जाने वाले विज्ञापनो मे सबसे अधिक संख्या सौन्दर्य प्रसाधनो की होती है। प्रत्येक कम्पनी के अपने अलग-अलग क्रीम, साबुन, बाॅडी लोशन, फेस वाश, फेस पैक इत्यादि की संख्या इतनी अधिक हैं कि गिनती करने बैठो तो लगता है कि पूरे बाज़ार मे इन्हीं की भरमार है। अब तो महिलाओं के साथ पुरूषों के अनेक प्रसाधन उपलब्ध है जिसका प्रचार-प्रसार बड़े-बड़े अभिनेता और क्रिकेट खिलाड़ी करते हैं। छुप-छुप कर लड़कियों वाली क्रीम लगाना अब बीते दिनो की बात हो गई। महिला दोस्त को आकर्षित करना है तो फलां प्रसाधन लगाइऐ अगले क्षण वह आपसे हंस-हंस कर बातें करती नज़र आऐगी। ऐसे मुर्ख बनाने वाले विज्ञापनो की एक होड़ सी लग गई है और लोग उन पर विश्वास कर के अधिक से अधिक भुगतान देकर इन प्रसाधनो को घर ले आते हैं।

व्यवसायीकरण और उद्धयोगीकरण का लाभ यह हुआ है कि हर तरह के आधूनिक एंव मंहगे से मंहगे उत्पाद हमे हमारे देश मे आसानी से मिल जाते है। अधिक से अधिक उत्पादन के कारण व्यावसाय मे प्रतिस्पर्धा तेज़ी से बढ़ी है जिसका परीणाम यह हुआ है कि हर अच्छे, बुरे, मिलावटी उत्पाद बाज़ार आ गऐ हैं और विज्ञापनो के द्वारा उन्हें अधिक संख्या मे उपभोकता भी मिल गऐ है।  व्यापारियों का धंधा तो फल-फूल रहा है परन्तु हम अपना जो नुकसान कर रहे हैं उसके प्रति अब हमे सचेत हो जाना चाहिए।


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