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Thursday, 19 December 2013

उद्देश्य से भटकता भारतीय सिनेमा



            



 पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत मे सिनेमा का उद्धभव और विकास कई सालों बाद हुआ पर आज यह जान कर हैरानी होती है कि भारत पूरी दुनिया मे सर्वाधिक फिल्में बनाने वाला देश है। जितनी तेज़ी से हमारे यहाँ फिल्म जगत का विकास हुआ है उतनी ही तेज़ी से हमारे समाज का आधुनिकरण भी हुआ है।

भारत जो दुनिया मे अपनी संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं के लिए जाना जाता रहा है आज उस पर पाश्चात्य सभ्यता का रंग सिर चढ़ कर नाच रहा है। फिल्मों मे आधुनिकरण के नाम पर जो रोमान्स, अशिष्टता, बेहुदा नाच, कम कपड़े, असभ्य भाषाऐं परोसी जा रही हैं उनका बच्चों और युवाओं पर क्या असर हो रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। स्कूली यूनीफार्म पहने 14-15 साल के बच्चे मुँह मे सिग्रेट दबाए, हाथों मे मोबाइल पकड़े ऐसी अशलील फिल्मे और दृश्य देखते हैं जिनकोे परिवार के साथ बैठ कर देखने की कोई कल्पना भी न कर सके। बच्चों की वह मासूमिसत, अल्हड़पन, बचपन कहीं खोता जा रहा है। मनोरंजन के नाम पर जो गंदी और अभद्र सामग्री परोसी जा रही है उसका बच्चो की मानसिकता पर जो दुष्प्रभाव पड़ रहा हे उसका परिणाम हमें आए दिन देखने को मिलता है। वे समय से पहले बालिग हो रहे हैं और उनके स्वाभाव एंव कार्यशैली मे एक प्रकार की अनुशासनहीनता, क्रूरता और असभ्यता दिखलाई पड़ती  है। वहीं दूसरी ओर युवा लड़कियाँ ठीक वैसा ही वस्त्र पहनना पसन्द करती हैं जो प्रयः एक्ट्रेस परदे पर पहनती हैं। अब कम कपड़ो को खूबसूरती और आधुनिकता से जोड़ कर देखा जाता है। ये आधे ढ़के आधे खुले परिधान कहीं से भी हमारे परंपावादी समाज का हिस्सा नज़र नहीं आते। परिधान वही अच्छे लगते हैं जो आकर्षक दिखने के साथ-साथ शरीर को भी ढ़के। आदिकाल मे मनुष्य वस्त्र के आभाव और अज्ञान होने के कारण अपने श्रीर के कुछ हिस्सों को ही पत्तो से ढ़कता था। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य एंव विकसित हुआ वैसे-वैसे कताई-बुनाई कर विभिन्न प्रकार के परिधान तैयार किए गए और पूरे शरीर को ढ़कना प्रारम्भ किया। पूरे कपड़े पहनने का चलन शुरू हुआ तो आधे-अधूरे कपड़े पहनने वालों को अभद्र और गंवार कहा जाने लगा, जिन्हें सभ्य समाज मे उठने-बैठने लायक नही समझा जाता था। वही वर्तमान मे फिर से कम व छोटे कपड़े पहन कर लोग क्या प्रमाणित करना चाहते हैं ? क्या हम फिर से आदिकाल की ओर लौट रहे हैं ? हम आदिमानव की भांति अभावग्रस्त एंव असभ्य नहीं है तो फिर क्यो हम जंगली लोगो जैसा रहन-सहन अपना रहे हैं?

आज मीडिया पुरी तरह व्यवसायिक हो चुका है। उनका एकमात्र लक्ष्य ऐसे दृश्य प्रदर्शित करना है जो अधिक से अधिक संख्या मे दर्शकों को सिनेमा घर खींच लाए और फिल्मो को हाउसफुल बनाए। इसके लिए अभिनेताओं को भारी रकम अदा की जाती है। उनकी फिल्म को करोड़ो का रूपयो का मुनाफा को यही उनका एकमात्र लक्ष्य होता है। फिल्म की शुरूआत मे महीन अक्षरों मे लिखा जाता है ‘‘धूम्रपान/शराब सेहत के लिए हानिकारक है। इससे कैन्सर होता है’’। इन महीन शब्दों पर ध्यान देने के बजाए युवा उन दृश्यों की ओर आकर्षित होते हैं जहाँ हीरो स्टाईल से एक हाथ मे सिग्रेट और एक हाथ मे शराब का गिलास पकड़े हिरोईन से मीठी-मीठी बातें करता है।

सिग्रेट, शराब, जुआ, डिस्को जैसे आधुनिक संसाधन आज के युवाओं की पहली पसंद है। हालांकि कुछ ऐसे भी है जिनके पारिवारिक संस्कार उन्हें बांधे रखते हैं और इन सारी बुराईयो से दूर रखते हैं परन्तु दोस्तों की संगत मे पिछड़े और दकियानूसी न कहलाऐं इसलिए मजबूरी मे ही सही इसे अपना लेते हैं।

किसी भी देश के युवा उस देश का भविष्य होते हैं। उसका स्वयं का और देश का विकास उसकी मेहनत, साहस, अच्छी सोच और अच्छी आदत पर निर्भर करता है। पर जिनका अधिकतर समय जुऐ, शराब, नृत्य और और भद्दे दृश्यों को देखने मे व्यतीत होता हो उनके मानसिक स्तर का अन्दाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। मान लो इन बुराईयों को अपनाने के बावजूद वे स्वंय को इतना सक्षम बना लें कि अच्छी शिक्षा एवं नौकरी प्राप्त करके अच्छी आय प्राप्त करने मे सफल हो जाऐं तो भी वे एक अच्छा और शांत जीवन नहीं जी सकते। कारण यह है कि वे अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा अपनी ऐययाशियों पर खर्च करेगे जो न ही उनके स्वयं के लिए हितकर होगा और न ही उनके परिवार के लिए ही कल्याणकारी होगा।

आजकल फिल्मों मे परोसी जा रही सामग्री को फैशन के नाम पर सब आँख मूँद कर अपना रहे है। अब इसे चूहा दौड़ कहें या बिल्ली दौड़ और इस दौड़ परिणाम क्या होगा, इसकी चिन्ता किसी को नही है। प्रश्न उठता है कि क्या सिनेमा का उद्देश्य यही है ?

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