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Thursday, 6 February 2014

क्या कभी खत्म होगा भारत और इण्डिया का अन्तर ?


     


मेरा भारत महान ! यह हम आम भारतीयों का नारा है। जहाँ एकता मे अखण्डता की बात कही जाती है। विश्व मे यह एकमात्र ऐसा देश है जहाँ धर्म, जाति, परम्पराऐं, रीति.रिवाज़, वेश-भूषा, खान-पान, रंग-रूप एवं भाषा में विभिन्नता होने के उपरान्त हम भारतवासी एक कहलाते हैं। अपनी मातृभूमि के लिए हम सभी के दिल में एक ऐसा प्यार का जज़्बा है जो हमे आपस मे जोड़े रखता है; परन्तु उपर्युक्त सभी विभिन्नताओं से परे हममें एक ऐसा अन्तर है जो हमे दो भागों मे विभाजित कर देता है। वह है अमीर-गरीब का अन्तर, जो देश मे भारत और इण्डिया का अन्तर प्रतिबिम्बित करता है। हमारे देश मे दो प्रकार के लोग रहते हैं। एक तरफ वे धन्नासेठ जो अपनी विलासिता मे पानी की तरह पैसा बहाते हैं और दूसरी तरफ वे जो गाँवो और शहरों मे फुठपाथ पर येन-केन प्रकारेण जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं। इस नग्न सत्य को रेखांकित करता हुआ एक आलेख।

           

भारत एक ऐसा देश है जहाँ एक तरफ 70 प्रतिशत ग्रामीण किसान और शहरी गरीब जो जी तोड़ मेहनत और मजदूरी के सहारे अपनी जि़न्दगी की गाड़ी चलाता है, वहीं दूसरी तरफ बड़े-बड़े व्यापारी, नेता एवं अधिकारी अपने निजी हवाई जहाज़ मे सफर करते है। एक तरफ व्यक्ति रोटी न मिलने के कारण भूख से मरता है और दूसरी तरफ ऐसे व्यक्ति भी है जो स्वादिष्ट व्यंजन इतनी अधिक मात्रा मे खा लेते है कि नयी-नयी बीमारियों से घिर कर मृत्यु को प्राप्त हो जाते है। एक ओर लोग रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दौड़-धूप करते हैं वहीं दूसरी ओर अपने शरीर की चरबी कम करने के लिए लोग मंहगे जिम मे भुगातान कर के घण्टों पसीने बहाते हैं। एक ओर भारतीय नेताओं एवे बड़ी कम्पनियों के मालिकों का अरबों-खरबों की राशि स्विस बैंक में जमा है तो दूसरी ओर कुछ ऐसे बेसहारा हैं जिनके नसीब में सिर छिपाने के लिए एक छत भी मयस्सर नही है।



देश में वैज्ञानिक तरक्की की बातें करे तो आज़ादी के पहले हम एक पिन तक का निर्माण नहीं कर सकते थे। आज व्यावसायीकरण और भूमण्डलीकरण के चलते हमारा देश पूरे विश्व मे हर क्षेत्र मे लोहा मनवा रहा है। तकनीकी रूप से हम इतने विकसित हो चुके हैं कि आज ज़्यादातर घरों मे टी0वी0, फ्रिज और हर हाथ मे मोबाइल फोन है। राजधानी दिल्ली के लोगों का रहन-सहन देख कर हमें किसी विकसित देश का गुमान होता है। पर उसी शहर का एक तबका सर्द रातों मे बिना गर्म कपड़ो और बिस्तर के दिल्ली के फुटपाथ और झुग्गी-झोपडि़यों मे काँपता हुऐ अपना जीवन यापन करने पर विवश है। आलीशान घरों के बंद कमरों मे रज़ाई मे दुबके और गर्मा-गर्म चाय-पकौड़ें का आनन्द लेते लोग इस बात का अन्दाज़ा भी नहीं लगा सकते के सड़कों को ही अपना आशियाना बनाने वाले उन बेचारों का जीवन किन कठिनाईयों मे बीत रहा है। जिनके पास न तन ढ़कने के लिए कपड़े है, न पेट भरने को रोटी और न सिर छिपाने के लिए छत।



हमारे देश के नीति-निर्धारक नेता और नौकरशाह सरकारी खज़ाने को विदेश यात्राओं और रंग-मंच सजा कर महोत्सव के बहाने नृत्य का आनन्द उठाने मे खर्च कर रहे हैं। जनता ने जिन्हें वोट दे कर देश व प्रदेश की बाग-डोर इस विश्वास से थमाई कि वे उन्हें बेहतर शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षित वातावरण मे सांस लेने का सुख प्रदान करेंगे पर वे तो रोटी, कपड़ा और मकान देने मे ही असमर्थ हो रहे हैं, जो जीवन की आवश्यक आवश्यकताऐं हैं। वोट माँगते समय इनके द्ववारा बड़े-बड़े वायदे किए जाते है और जब जीत गए तब सारे वायदे इनके दिल-दिमाग से ऐसे गायब हो जाते है जैसे गधे के सिर से सींग। कोई गरीबी खत्म करने का संकल्प लेता है तो कोई देश को स्वर्ग बनाने की बातें करता है किन्तु एक बार सत्ता हाथ मे आ गई तो ये गरीबों को ही जड़ से उखाड़ फेकने का कार्य करने लगते हंै।



ऐसा नही है कि भारत का विकास नहीं हो रहा है। पिछले 60 सालों मे देश ने जितनी गति से विकास किया है, उतना शायद ही किसी देश ने किया हो पर दुर्भाग्य यह है कि इस विकास प्रक्रिया मे समाज का एक बड़ा हिस्सा अछूता रह गया है। सरकारी नीतियों के चलते गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को मुफ्त अनाज, बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा, महिलाओं के प्रसव के दौरान मुफ्त इलाज एवं गाड़ी से लाने ले-जाने के लिए वाहन की निःशुल्क सुविधा इत्यादि मुहैया करायी जा रही है पर भ्रष्ट अधिकारियों एवं मंत्रियों के चलते ये सुविधऐं ज़रूरतमन्दों तक कम पहुँच पा रही है। गरीबों के उत्थान के लिए न जाने कितने कानून एवं नीतियाँ पारित की गई हैं परन्तु उसके दस्तावेज़ किसी कोने मे धूल चाट रहे हैं। वह योजनाऐं कागज़ो मे ही सिमट का रह गई हैं।



देश के भ्रष्टाचार मे लिप्त नेताओं और नौकरशाहों के चलते गरीब परिवार मे जन्मा बच्चा अशिक्षित और बेरोज़गार होने के कारण गरीब ही रहने के लिए अभिशप्त है और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि उनका वंश आगे आने वाले सालो मे अपनी गिनती मे कई गुना वृद्धि करता रहेगा। कल जो सौ की संख्या मे थे आज हज़ार हो गए हैं और भविष्य मे करोड़ो की संख्या मे हो जाऐगें। पूर्व राष्ट्रपति डा0 ए0 पी0 जे0 अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक ‘‘भारत 2020’’ मे लिखा है कि वर्ष 2020 तक प्रत्येक भारतीय शिक्षित होगा और बेहतर रोज़गार से जुड़ा होगा। हर घर मे बिजली-पानी की सुविधा होगी और हमारा भारत एक विकसित देश के रूप मे उभर कर दुनिया के सामने आएगा पर आज भी जिस देश मे बच्चे भूख और ठण्ड से मर रहे हैं वहाँ इन छः सालों मे डा0 कलाम की यह कल्पना साकार होती नहीं दिखाई दे रही है।



जिस महात्मा गाँधी के नेतृत्व मे देश के क्रांतिधर्मी बहादुर देशभक्तों ने अपनी शहादत दे कर अंग्रेज़ों की गुलामी से देश को आज़ादी दिलाई। जिन्होने गरीबों और हरिजनों को बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए सालो संघर्ष किया। आज उसी देश ने गरीबों को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है। बड़ी-बड़ी गाडि़यो मे सवार ये सम्भ्रांत जन फुठपाथ पर बैठे बेसहारा-मज़दूर बच्चों को ऐसी नज़रो से देखते है जैसे उन गरीबों का इन्सानो की दुनिया से कुछ लेना-देना ही न हो। यही है हमारे भारत और इण्डिया का अन्तर जो आगे चल कर और भी भयावय स्थिति बनाता नज़र आ रहा है। क्या कभी हमारे देश के कर्णधार इस गरीब भारत पर भी एक दृष्टि डालेंगे?





                                                           



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