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Monday, 5 May 2014

आधुनिकरण का हमारी मानसिक स्थिति पर प्रभाव

पिछले 10-15 सालों मे हमारी जीवनशैली में जो बदलाव आऐ हैं उसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। समय के साथ-साथ लोगों की पसन्द, नापसन्द, शौक, गतिविधियों मे निरन्तर बदलाव हो रहे हैं। पहले बच्चे स्टांप, सिक्के और तस्वीरें जुटाने मे अधिक  खुशी महसूस करते थे ; वहीं आज के बच्चे व युवा इण्टरनेट पर चैटिंग करना, मोबाइल/कंप्यूटर गेम, आॅनलाईन शाॅपिंग, फोटो खींच कर इण्टरनेट पर अपलोड करना तथा नई तकनीक व गैजेट्स के बारे मे पढ़ना पसन्द करते हैं।



आज भी याद है वह दिन जब पूरा मोहल्ला एक टी0वी0 के सामने भीड़ लगाऐ चैके-छक्कों पर सीटियाँ मारता था, जब 10-12 घरों के बीच एक घर मे फोन होता था और उस पर पूरे मोहल्ले वालो का फोन आता था, जब हम बच्चो का पसन्दीदा और एकमात्र शो शक्तिमान देखने के लिए शनिवार को स्कूल न जाने के लिए हम बहाने करते और डाँट कर भेजे जाने पर छुट्टी होते ही दौड़ते-भागते आते, जब कोई कार्टून चैनल नही था और हम रंग-बिरंगी मनमोहक काॅमिक्स मे अपने पसन्दीदा हास्य पात्र के साथ हँसते-खिलखिलाते थे, जब दस रूपय मे दोस्तों के साथ आईस्क्रीम और समोसे की पार्टी कर लेते थे, जब रात मे सारे बच्चे दादी-नानी को घेरे बैठे परियों की कहानियाँ सुनते और सपनों की दुनियाँ मे परिलोक की सैर करते, जब एक ही कमरे में 4-5 बच्चे मिल कर सोते और शरारत मे एक-दूसरे की चादर खींचते। पीछे पलट कर देखती हूँ तो लगता है इन 10 सालों मे कई सदियाँ बीत गयी। पहले सब मिल कर टी0वी0 देखते, खेलते, झगड़ते और आज बच्चे बाहरी दुनिया से कट कर घण्टों टी0वी0 और कंप्यूटर के आगे बैठ कर दोस्त बनाते और दुनियाँ घूमते। आज हम मीलों दूर बैठे विभिन्न देश-प्रदेश के व्यक्तियों को इण्टरनेट के द्वारा जन्मदिन की बधाईयाँ देते और घर मे माता-पिता का हाल-चाल पूछने का समय नहीं होते हमारे पास। हम अपने हर सुख-दुख चैटिंग के द्वारा अन्जान दोस्तों से साझा करते हैं और घर के बड़ों के पूछने पर मुँह फुला कर बोलते हैं-‘‘ आप मुझे कभी समझ ही नहीं सकते’’।

आधुनिक तकनीक ने हमे एक नयी दुनिया मे ला कर खड़ा कर दिया है जहाँ हम रिशतो से दूर और गैजेट्स के नज़दीक हो गए है। सोशल साईट्स और स्र्माटफोन के बढ़ते दायरे के चलते लोगों के शौक पर तकनीकीकरण का पर्दा चढ़ना हैरत की बात नहीं है। विभिन्न मोबाईल कंपनियाँ युवाओं के रूझान को देखते हुए हर रोज़ एक नया स्मार्टफोन पर्याप्त मूल्य पर बाज़ार मे उतार रही है। इसके चलते आज हर कोइ अपने हाथों मे पूरी दुनियाँ समाय हुए है। विभिन्न सर्वे व शोध के अनुसार चैटिंग और शाॅपिंग के अलावा आज लोग उपयुक्त जीवनसाथी की तलाश, स्वास्थ्य सम्बन्धी सलाह, सौन्दर्य परामर्श, सर्वक्ष्रेष्ठ आॅफर का लाभ उठाने, नयी तकनीक की जानकारी जुटाने व ब्लाग/ट्वििटर पर विचार व्यक्त करने के लिए इण्टरनेट का रूख करते है। अब हमें किसी ज़रूरत के लिए किसी व्यक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती, अब हमारी हर समस्या का हल उस छोटे से डिब्बे में कैद है। जिस व्यक्ति के पास यह डिब्बा नही वह इस धरती का महा मुर्ख व्यक्ति है, जिसे आज की पीढ़ी पिछड़ा कहते हुए ज़रा भी नही सकुचाती। नयी शताब्दी के शुरूआती दौर मे जिस चीज़ का नाम-व-निशान तक न था आज वह हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है।

इण्टरनेट से परे आज घर के हर कमरे में ए0सी0, हर हाथ में 2-3 मोबाईल फोन, टी0वी0 पर हर आयु वर्ग के रूझान को देखते हुए तकरीबन 100-150 चैनल, पार्टियों मे पिज़्ज़ा/बर्गर/सैन्डविच, कटे-तराशे परिधान इत्यादि हमारे शौक ही नहीं वरन् ज़रूरत बन गए हैं। पश्चिम से चली इस आँधी ने निश्चिंत रूप से हमारी जीवनशैली मे सकारात्मक परिवर्तन किया है। हम एक तरफ तो आधुनिक हो गए परन्तु दूसरी ओर एकांतवासी भी हो गए है। लोगों के बीच रिशतों व अपनेपन की समझ समाप्त हो गयी है जो निश्चिंत रूप से किसी भी परिवार व समाज के हितकर नहीं है। अकेलेपन के चलते आज छोटे-छोटे बच्चे मधुमेह, रक्तचाप, दिल की बीमारियों से घिरे नज़र आते हैं। इस तरह उनकी मानसिक स्थिति को भी चोट पहुँचती है जिस कारण वे पढ़ाई व खेलकूद मे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते और लागों को सामना करने मे खबराते व हिचकिचाते है। वे अपनी एक छोटी सी अलग दुनिया बसा लेते हैं जहाँ के वे राजा होते हैं पर बाहरी दुनिया का सामना करने का सामर्थ उनमे नहीं हांता। आज हज़ारो अभिभावक अपने बच्चो को मनोचिकित्सक के पास परामर्श हेतु ले जाते है क्योंकि उन्हें लगता है उनका बच्चा सामान्य बच्चो की तरह व्यवहार नहीं करता। मनोचिकित्सकों का भी मानना है कि पहलें की तुलना अब ऐसे केस मे 70-80 प्रतिशत वृद्धि हुई है। इसका कारण है कि अब बच्चे अपनी उलझनो को सुलझाने ओर किसी प्रकार की सलाह के लिए अभिभावक से परामर्श करने के बजाए अपने दोस्तों व इण्टरनेट से समाधान ढ़ँूढ़ते है। आज की व्यस्त जीवनशैली मे अभिभावक भी पहले की अपेक्षा अब बच्चों पर कम ध्यान देते है। बचपन मे प्ले-स्कूल फिर थोड़ा बड़े होने पर स्कूल, कोचिंग व हाॅस्टल भेज कर अपनी जि़म्मदारियों से बरी हो जाते है। एकल परिवार अथवा छोटी उम्र से ही बच्चो को अलग कमरे का बढ़ता चलन उनकी मसनसिक स्थिति को खतरनाक हद तक प्रभावित करता है। वे अकेलेपन और कुण्ठा का शिकार हो जाते हैं। पहले जहाँ बच्चे दादा, दादी, चाचा, बूआ से लाड उठवाते थे वहीं आज एकांत कमरे मे मोबाईल/कंप्यूटर के सामने बैठे पूरा दिन बिता देते है। आश्चर्य होता है यह देख कर कि कहाँ लोग अपने गली-मोहल्ले के हर घर की खबर रखते थे और अब अपने बच्चों के साथ समय बिताने व उनकी मानसिकता को समझने मे असमर्थ दिखलाई पड़ते है। आए दिन हो रहे शोध से यह प्रमाणित हो चुका है कि पहले की तुलना मे अब बच्चे निश्चिंत रूप से अधिक निपुण व बुद्धिमान होते है पर यह भी नही झुटलाया जा सकता कि अब शारीरिक व मानसिक रूप से वे पहले की अपेक्षा मज़बूत व सपृष्ट नहीं हैं।

क्या यही है हमारा आधुनीकरण ? क्या इस आधुनीकरण के चलते हम अपनी नयी पीढ़ी को मानसिक रूप से आस्वस्थ बनाने का जोखिम उठा रहें है ? इसका उत्तर और समाधान शायद हममे से किसी के भी पास नही है।



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