देश की विकराल होती जनसंख्या के कारण बढ़ती समस्यायों में से एक है बेरोज़गारी । हम हर मोर्चे में युवा भारत का नारा लगाते हैं पर इन्हीं युवाओं के विकास, बेहतर रोज़गार और भविष्य के लिए भारत सरकार ने कितनी नीतियाँ पारित की ; यह किसी से छिपा नहीं है। युवा देश की पूँजी होता है, यदि देश को समृद्ध एवं सम्पन्न बनाना है तो सर्वप्रथम देश के युवाओं को बेहतर भविष्य प्रदान करना होगा।
आज अभिभावक इस कड़ी मंहगाई में घर खर्च पूरा करने के साथ-साथ अपने बच्चों के मँहगे काॅलेजों की फीस जमा करने हेतु कड़ी मेहनत करते हैं। जब बच्चा अच्छे नम्बरों से पास हो कर डिग्री लिए नौकरी ढ़ूँढ़ने निकलता है तो बूढ़े माँ-बाप की आँखों मे एक आस होती है कि अब उनका बेटा उनके कमज़ोर कन्धों का सहारा बनेगा। पर एक अच्छी डिग्री होने के उपरान्त उसे नौकरी नहीं मिलती क्योंकि हमारे देश मे प्रतिभायें तो बहुत हैं पर अवसर बहुत कम । हमें अपनी प्रतिभाऐं दिखाने का अवसर नहीं मिलता क्योंकि आज हर छोटे-बड़े पद के लिए लम्बी लाइन लगी होती है। ये तो हो गई गैर सरकारी संस्थानो की बात। सरकारी संस्थानो की दशा और भी दयनीय है, जहाँ लम्बी लाईनों के साथ सरकारी अफसरों की हथेलियाँ भी गर्म करनी होती है। अवसर उन्हीं को मिलता है जिनके पास करोड़ों का बैंक बैलेन्स हो , नेता-मंत्री से अच्छे सम्बन्ध हो, सुन्दर व्यक्तित्व हो इत्यादि। इन आधारो पर हो रहे पक्षपात हमारे यहाँ अकसर देखने को मिलते हैं। योग्य न होने पर भी यदि किसी ने मोटी रकम सामने रख दी तो समझो नौकरी पक्की। यह है वह जंग जिससे देश का हर युवा लड़ता है। जिसमे जीतने वालो की गिनती बस नाममात्र ही होती है।
गैर सरकारी कम्पनिया अपना कार्यालय एवं फैक्ट्री बड़े-बड़े शहरों मे स्थापित करती हैं जहाँ उन्हें अधिक से अधिक मुनाफा होता है। छोटे शहरों के लोग जब डिग्री लेकर दिल्ली, मुम्बई व पूणे जैसे बड़े शहरों में पहुँचते हैं तो वहाँ उन्हें छोटे शहर की डिग्री का ताना दे कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। हमारे उत्तर प्रदेश मे कई बड़े शैक्षणिक संस्थान हैं जो छात्र-छात्राओं को गुणात्मक व आधुनिक शिक्षा प्रदान कर रहें हैं परन्तु व्यवसायिक क्षेत्र मे हम आज भी बहुत पीछे हैं। यहाँ न राष्ट्रीय/अन्तराष्ट्रीय कम्पनियाँ काम करती है और न ही बड़ी फैक्ट्रियाँ व अस्पताल। यहाँ के युवाओं को नौकरी ढ़ूँढ़ने प्रदेश से बाहर निकलना पड़ता है जहाँ किस्मत के घनी एक-दो को छोड़ कर बाकी सब को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है। यदि ये सारी सुविधाऐं एवं विकल्प हमारे प्रदेश मे ही उपलब्ध हो जाऐ ंतो फिर हमें और कहीं जाने की आवश्यकता ही न पड़े। समस्या का समाधान युवाओं को बेरोज़गारी भत्ता देने या फिर मुफ्त लैपटाॅप बाँटने से नहीं होने वाला। इसके लिए सरकार को एक सशक्त नीति निर्धारित करनी होगी। यदि ऐसा नहीं किया गया तो ये युवा देश की ताकत नहीं वरन् कमज़ोरी के रूप मे सामने आयेंगे और भारत विकासशील से विकसित देश की ओर कभी नहीं बढ़ पाऐगा।
लोकसभा चुनाव 2014 का परिणाम घोषित हो चुका है। देश की जनता ने अपना बहुमूल्य मत देकर जिनके हाथों मे सत्ता सौंपी है, उनसे वह यह अपेक्षा करती है कि वे उनके उज्जवल भविष्य का सपना साकार करेंगे। आने वाले दिनो मे केन्द्र सरकार इस ओर अपनी दिव्य दृष्टि करती है या नहीं यह तो समय बताएगा पर सत्ताधारियों को यह समझ जाना चाहिए कि हमारा एक वोट उन्हें कुर्सी दिला सकता है तो उनहें कुर्सी से नीचे भी फेंक सकता है। पिछली सरकार से हताश और निराश जनता ने इस निर्वाचन में उसे कैसी धूल चटाई है यह तो निर्वाचन परिणाम आने से पहले पता चल गया था। नई सरकार का नारा है ‘‘हम विकास लाऐंगे’’। पर इतिहास गवाह है कि नेताओं की कथनी और करनी मे ज़मीन-आसमान का अन्तर होता है। इस निर्वाचन देश की जनता ने बहुत सोच-विचार कर एकाधिकार जमाए पिछली पार्टी को सिरे से नकारते हुए पूर्ण बहुमत देकर केन्द्र मे एक नया चेहरे पर अपना विश्वास जताया है। जाति-पाति-धर्म के बन्धन को तोड़ कर किसी एक पार्टी को नहीे बल्कि एक व्यक्ति विशेष को अपना पूरा समर्थन दिया है। विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े प्रदेशों की जनता इस नए सत्ताधारी से अपेक्षा कर रही है कि वह उनके शहरों मे नया विकास माॅडल लागू करेगें और वह दिन दूर नहीं जब हमे रोज़गार के लिए अन्य शहरों मे नहीं भटकना पड़ेगा। आँकड़े बताते है कि इन प्रदेशों में कांग्रेस व क्षेत्रीय पार्टियों की किस बुरी तरह से हार हुई है, जो पार्टिया कभी सत्ता मे थी उनमे से कितनो का खाता भी नहीं खुल पाया । अब देखना यह कि देश के नए प्रधानमंत्री जनता की उम्मीदो पर कितना खरा उतरते है।
चीन हमसे अधिक आबादी वाला देश होने पर भी आर्थिक स्थिति मे हमसे कहीं मजबूत है। वहाँ का 90-92 प्रतिशत युवा रोज़गार से लगा हुआ है और वहाँ का गरीब व्यक्ति भी दो समय का खाना जुटाने मे सक्षम है। वहाँ जितनी प्रतिभाऐं हैं उतने ही अवसर है तो फिर हम आखिर क्यों ये अवसर उपलब्ध कराने में असफल है। हमारें देश का अरबों-खरबों का काला घन स्विस बैंक मे जमा है, देश मे अनगिनत घोटाले हुए जिस पर पिछली सरकार ने अब तक चुप्पी साध रखी है। यदि यही धन देश के विकास कार्य मे लगाया जाता तो आज शायद हम चीन से कहीं आगे होते। पर हमारे यहाँ की स्थिति ही अलग है, अमीर अमीर होती जा रहा है और गरीब बेचारा एक समय का खाना जुटाने मे अक्षम है।
यदि हमारे यहाँ हर छोटे-बड़े शहरों मे कम्पनी, फैकट्री, अस्पताल या व्यवसायिक व पेशेवर क्षेत्रो में अन्य विकल्प लोगों के लिए उपलब्ध कराऐ गए तो निश्चिंत रूप से देश की आर्थिक स्थिति मे जो परिवर्तन आऐगा वह अत्यन्त लाभकारी होगा। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रतिभा व शिक्षा के अनुरूप रोज़गार मिलेगा, उनके घर सुख-समृद्धि आऐगी और देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी। सरकार को युवा भारत का समर्थन तभी मिलेगा जब वह उनके विकास के लिए सकारात्मक प्रयास करेगी। देश की आर्थिक स्थिति सुधारने मे विभिन्न क्षेत्रों मे रोज़गार कर युवा अपना योगदान देंगे और बदले मे कम्पनियाँ उन्हें भुगतान कर के उनकी माली हालत सुधारेगीं। जब दोनो ओर से लाभ ही लाभ है तो आखिर सरकार अब तक क्यों मौन है। देश की जनता नई सरकार से केवल अपेक्षा ही नहीं अपील करती है कि वह इस ओर अपनी दिव्य दृष्टि कर एक सशक्त राष्ट्रीय नीति पारित करे।
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