‘‘विद्या ददाति विनयम विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनम्वाप्नोति धनाद्धर्मः तत सुखम्।।
उक्त पक्तियाँ अर्ष ग्रन्थों की सूक्ति है जिसमे शिक्षित व्यक्ति का लक्षण बताये गये है। इस श्लोक का अर्थ यह है कि-विद्या विनम्रता को देती है, विनम्रता से व्यक्ति मे पात्रता अर्थात योग्यता आती है, योग्ता द्वारा व्यक्ति मे समृद्धि आती है अर्थात व्यक्ति मे सम्पन्नता आती है और इससे व्यक्ति धर्म का आचरण करने लगता है और तभी मनुष्य सुखी होता जाता है।
वस्तुतः यह सूक्ति सदियों पुरानी है जब स्नातक से अपेक्षा की जाती थी कि वह विनम्रता, मानवीय योग्यता,, सहृदयता और श्रमक्षीणता की प्रतिपूर्ति होगा। आज उर्पयुक्त सूक्ति अप्रासांगिक हो चुकी लगती है। इसका कोई एक कारण नहीं है। परिवार, विद्यालय और समाज सभी बच्चों को एक अच्छा नागरिक नहीं येन केन प्रकारेण पैसा कमाने की मशीन बनाना चाहते हैं। आज़ादी के बाद देश निरन्तर विकास की बुलन्दियाँ छू रहा क्योंकि देश में शिक्षा कर स्तर तेज़ी से बढ़ा है। पुरूषों के साथ महिलाओं में भी उच्च शिक्षा ग्रहण करने की ललक देखने को मिल रही है। पर विडम्बना यह है कि शिक्षा की अनिवार्यता को देखते हुए देश की शिक्षा नीति ने इसे व्यवसाय बना दिया है।
आज अच्छी एवं उच्च शिक्षा के लिए हम बड़े शिक्षण संस्थानों मे प्रवेश लेते हैं, जो मंहगे शुल्क के साथ-साथ डोनेशन की भी माँग करते हैं। इन मंहगे काॅलेजो के साथ कोचिंग की हर क्लास में सैंकडों की संख्या मे विद्यार्थियों की भरमार एक धंधे के रूप मे उभर रही है। व्यवसायिक पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण देने वाली कोचिंग प्रति विद्यार्थी लाखों का शुल्क चार्ज करती है। इन शैक्षणिक संस्थानों का एजेण्डा विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करना नहीं वरन् अधिक से अधिक बच्चे इकठ्ठा कर मंहगी फीस ले कर अपनी तिजोरी भरना होता है। इनका धंधा फल-फूल रहा है क्योंकि आज इस प्रतिस्पर्धा के दौर मे हर कोई अच्छी से अच्छी शिक्षा ग्रहण करने की चाह रखता है। मंहगे शिक्षण संस्थान से डिग्री प्राप्त करने का अर्थ बेहतर रोज़गार का विकल्प है । साक्षात्कार के समय नियोक्ता कम्पनियाँ प्रत्याशी की काबिलियत से पूर्व सर्वप्रथम यह देखती हैं कि उसकी डिग्री किसी उच्च व मंहगे शैक्षणिक संस्थान से है या नहीं।
उत्तर प्रदेश की बात करें तो प्रदेशिक स्तर पर निचले मानक की प्राथमिक शिक्षा विशेष रूप से बेसिक प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा की कोई पूछ नहीं है। यूपी बोर्ड से पढ़ा बच्चा राष्ट्रीय स्तर की सी0बी0एस0सी0 और आई0सी0एस0सी0 बोर्ड से शिक्षा ग्रहण कर रहे बच्चे के समक्ष निरा बेवकूफ समझा जाता है। इसका कारण है यहाँ के उ0प्र0 बोर्ड की शिक्षा मे बढ़ रही नकलबाज़ी व धांधली जिसके चलते बच्चों का मानसिक स्तर न्यूनतम हो गया है। जब घूसखोरों की हथेलियाँ गर्म कर के बच्चों को पूरी काॅपी खोल कर नकल करा दी जाती है तो वह क्यों पढ़ने-लिखने मे अपना सिर खपाऐगा। परीक्षा के दौरान ऐसे न जाने कितने नकलची पकड़े जाते है और जो नही पकड़े जाते वे इसका जम कर लाभ उठाते हैंै। प्रदेश सरकार का यह भी आदेश है किऐसी शिक्षा व्यवस्था अथवा परीक्षा व्यवस्था हो कि बच्चे अनुत्तीर्ण न हों । सरकार की तरफ से मिड डे मील की व्यवस्था मे भी अनगिनत धांधली हो रही और सब अपनी तिजोरी भरने के चक्कर मे लगे हुए, जिनकी कहीं कोई पकड़ नही है। इसी कारण आजकल अग्रेज़ी स्कूलो का चलन तेज़ी से बढ़ा है। यही स्थिति आज हर प्रदेश की है। आज हर गली-मुहल्ले में 10-12 कमरों पर खड़ा अंग्रेज़ी स्कूल के नाम से सैंकड़ों संस्थान अभिभावकों को लूट रहा है। अभिभावक इस कमर तोड़ मंहगाई मे अपने बच्चों को अंग्रज़ी स्कूल मे पढ़ाने की ललक लिए इन धंधाखोरों की तिजोरियाँ भर रहे हैं। इन शिक्षण संस्थानो के शिक्षक कक्षा में आधा-अधूरा ज्ञान दे कर विद्यार्थिर्यों को अपनी व्यक्तिगत कोचिंग मे आमंत्रित करते हैं ताकि संस्था से प्राप्त आमदनी के अलावा व्यक्तिगत रूप से बच्चों से पैसे ऐंठ कर वेतन मे वृद्धि कर सकें।
देश की शिक्षा व्यवस्था बड़ी ही दयनीय है। राष्ट्रीय व प्रदेशिक स्तर पर विभिन्न शिक्षा और हर बोर्ड की प्रणाली व मान्यता मे विभिन्नता के कारण बच्चों व युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। पूरे देश मे एक समान शिक्षा प्राणाली हो, शिक्षा शुल्क एक समान व न्यूनतम हो ताकि देश का हर बच्चा व युवा अच्छी से अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सके और विभिन्न शिक्षा बोर्ड व उच्च ख्यातिलब्ध काॅलेजों की डिग्री के आधार पर उसे पक्षपात न सहना पड़े। शिक्षा समिति को हर गली मुहल्ले मे खुल रहे अंग्रज़ी स्कूल व कोचिंग अथवा महाविद्यालयों पर पैनी दृष्टि रखने की आवश्यकता है। शिक्षा के नाम पर व्यापार चलाने और लोगों से पैसा ऐंठने वाले इन संस्थानों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई करना अत्यन्त आवश्यक है। यह देश के युवाओं के साथ नहीं वरन् सम्पूर्ण देश के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है क्योंकि देश का युवा ही देश का भविष्य और पूँजी होता है। युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का अर्थ देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है। भारतीय संविधान ने हर नागरिक को शिक्षा का अधिकार दिया है परन्तु शिक्षा व्यवस्था मे हो रही घांधली पर अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया। देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे शिक्षाविदों और मनीषियों के नाम पर अनेकों आयोग का गठन किया गया। उनके प्रत्येक बिन्दु पर सुझावनात्मक एवं परिवर्तनात्मक रिपोर्ट भी आई लेकिन आज तक उन पर अमल नहीं किया गया। अन्य आयोगों की संस्तुतियों की भाँति उसे भी ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। परिणाम स्वरूप आज भी लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति पूर्णतः लागू है। यह शिक्षा नीति हमारे नौजवानों को पंगु बना रही है।
मोदी सरकार के 46 मंत्रियों मे मानव संसाधन विकास मंत्रालय स्मृति ज़ूबीन इरानी को सौंपने पर बी0जे0पी0 सरकार सवालों मे घिर गई। विपक्ष ने पलटवार कर देश की नई शिक्षा मंत्री के स्नातक भी न होने की दशा को मुद्दा बना कर मीडिया मे उछाला । हाँलाकि कुछ हद तक यह कहना सही होगा कि देश का सम्पूर्ण मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कार्यभार उठाने वाली मंत्री स्वयं स्नातक भी न हो तो वह शिक्षा व्यवस्था एवं प्राणाली मे क्या सुधार कर पाएंगी। पर मंत्री जी ने यह कह कर सबको चुप करा दिया कि देश उनकी शैक्षिक योग्यता नहीं बल्कि आने वाले दिनो में उनके कार्यों को देखे जिसमे वह जनता को कभी निराश नहीं करेगी।
देश की जनता शिक्षा मंत्रालय से यह निवेदन करती है कि वह पूरे देश में एक शिक्षा प्रणाली एक पाठ्यक्रम लागू करने हेतु विधिक व्यवस्था करे ताकि मंहगे शिक्षण संस्थानों में चल रही मुनाफाखोरी एवं चन्दा उगाही बंद हो और केवल उन्हीं शैक्ष्णिक संस्थानों को लाइसेन्स व मान्यता प्रदान करें जिनका शिक्षा स्तर वास्तव मे उत्तम हो।
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