Translate

Tuesday, 15 July 2014

मोदी एक्सप्रेस बनाम आम भारतीय



अच्छे दिन आने वाले हैं। भाजपा सरकार का यह वक्तव्य भारतीय जनता के लिए कितना हितकर सिद्ध हुआ है यह रेल बजट आने के बाद साफ दिखलाई पड़ रहा है। आम नागरिक जो दो वक्त की रोटी के लिए भाग-दौड़ करता है उसके लिए यह रेल बजट वरदान सिद्ध नहीं हो पाया है। वर्तमान रेल बजट भारत जैसे विकासशील देश के लिए नही दिखलाई पड़ रहा क्योंकि यहाँ की जनता अच्छे दिनों का आशय रेल भाड़े मे छूट, सुरक्षा व बेहतर रेल यात्री सुविधा से लगाती है। जहाँ तक महिला सुरक्षा की बात है पिछली सरकार ने भी इसके लिए महिला सुरक्षा बल व हेल्पलाइन की सुविधा देने का वायदा किया था पर  ट्रेनों मे हो रहे महिलाओं के विरूद्ध जघन्य अपराध लगतार अखबार व न्यूज़ चैनलो की हेडलाइन हेाने के बावजूद कोई सुरक्षा की स्थिति दूर-दूर तक नज़र नही आती।

रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने 8 जुलाई को घोषित अपने पहले बजट मे मुम्बई से अहमदाबाद के लिए 1 बुलेट ट्रेन और अन्य मार्गों के लिए 9 सेमी हाई स्पीड ट्रेनों की घोषणा की है। ये ट्रेनें पुरानी पटरियों पर नही चल सकती इसके लिए नई लाइनें बिछानी होंगी, खास तौर पर बुलेट ट्रेन के लिए। हाई-स्पीड ट्रेनों के लिए चतुर्भुज परियोजनायें हैं जो कि चार महानगरों-दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता और चेन्नई को जोड़ेगी। इन  हाई स्पीड ट्रेनों के लिए 100 करोड़ रूपयों की घोषणा हुई है। इतनी रकम मे तो बस 1 कि0मी0 तक ही पटरी बिछाई जा सकती है। मंत्री जी ने शायद इस ओर ध्यान देना आवश्यक नहीं समझा। दूसरी ओर देखने वाली बात यह है कि दुनिया के कई देशों मे 300-700 कि0मी0 की दूरी के बुलेट ट्रेन है जिसके द्वारा 2-3 घण्टे का सफर पूरा किया जाता है। इतनी दूरी के लिए भारत मे पहले ही ऐसी कई ट्रेनें मौजूद हैं। यदि उसी की व्यवस्था सुधार दी जाए तो बुलेट ट्रेन की आवश्यकता ही न पड़े। अधिक दूरी के लिए विमान पहले ही मौजूद है और बुलेट ट्रेन का किराया विमान के किराये के आस-पास ही होगा। एक गरीब व्यक्ति के लिए बुलेट ट्रेन का भाड़ा उसकी जेब से बाहर होगा, अतः वह साधारण रेलगाड़ी से जाएगा और अमीर व्यक्ति उसी भाड़े मे विमान का विकल्प चुनेगा। जब बुलेट ट्रेन की सुविधा न भारत की आम जनता उठा सकती है न खास जनता तो फिर वह हमें अच्छे दिन कैसे दिखाएगी ? साथ ही साथ रेलवे मे प्रसिद्ध ब्रांड के रेडी-टू-ईट खाने की व्यवस्था और बड़े स्टेशनों पर फूड कोर्ट से मोबाइल द्वारा खाना आर्डर देने की सुविधा भी देने का वायदा किया गया है। हमारे देश का एक आदमी जिसकी मासिक आय 950 रूपये है वह गरीब नहीं कहलाता पर अपनी इस आमदनी में वह इन ब्रांडेड कम्पनियों से एक प्लेट खाना भी आर्डर नहीं कर सकता।

इस बिन्दु को भी अनदेखा नही किया जा सकता कि देश के पश्चिमी क्षेत्र को रेल बजट से पूर्ण रूप से वंचित रखा गया है। पश्चिम बंगाल व उत्तर पूर्व के प्रदेशों के लिए रेल बजट मे कोई परियोजना लागू नहीं की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह बजट प्रधानमंत्री के गृह राज्य को ध्यान में रख कर बनाया गया है। किसी एक क्षेत्र के लिए विशेष परियोजना लागू करना और किसी दूसरे क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा करना किसी भी देश के बजट की ऐसी नीति को सही नहीं ठहराया जा सकता।

देश की युवा पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए गौड़ा जी ने छात्रों के लिए रेल विश्वविद्यालय की स्थापना और अभिनव उद्यम केन्द्र के गठन का प्रस्ताव भी रखा है। साथ ही साथ प्रबंधन व इन्जीनियरिंग के छात्रों के लिए समर इंटर्नशिप और स्नातक स्तर पर रेल सम्बन्धी विषयों को चालू करने की घोषणा भी की है। इस परियोजना को स्थाई रूप देने के लिए 5-6 वर्ष लग जाएगें, तब तक वर्तमान सरकार का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार पिछली तमाम परियोजनाओं की भाँति यह भी ठण्डे बस्ते में ही जा सकती है। विदेशों की तर्ज पर भारतीय रेल को भी 5 साल के भीतर पेपरलेस अर्थात कम्प्यूटरीकृत कर देने की भी कल्पना है। मंत्री जी ने इस बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया कि भारत की आधी आबादी आज भी कम्प्यूटर शिक्षा से अनभिज्ञ है। अतः वे लोग रेल सुविधा का लाभ कैसे उठाएगें ? यह रेल बजट हमारी समझ में बड़े नेताओं, नौकरशाहों, उच्चस्तरीय उद्योगपतियों, तस्करों और हर क्षेत्र में मौजूद पँूजीपतियों की सुविधा को ही दृष्टि में रख कर बनाया गया प्रतीत होता है जिसमे गरीब जनता को सिरे से नकारा गया है।

रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने अपना पहला बजट प्रस्तुत करते हुए एक घण्टे के भाषण मे यूपीए सरकार की कमियों गिनाते हुए यह भी कहा कि पिछले 10 सालो में 60,000 करोड़ रूपये मूल्य की 99 नई परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई, जिनमे से आज तक सिर्फ एक परियोजना को ही पूरा किया गया है। पर मंत्री जी ने अपनी एनडीए सरकार द्वारा जनता को अच्छे दिन का सपना दिखाने का वचन देेने के उपरान्त जो रेल बजट प्रस्तुत किया है वह आने वाले दिनो मे आम भारतीयों के लिए कड़वी दवा साबित होगी या मीठा फल, इसका अन्दाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।

समूचे भारतीय रेल बजट देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री और रेलमंत्री ने कभी आम आदमी की तरह देश की सामान्य रेल गाडि़यों मे यात्रा नहीं की अन्यथा वे रेलवे प्लेटफाॅर्म की गंदगी, छुट्टा पशुओं की आवाजाही, आवारा कुत्तों, बड़े-बड़े चूहों, प्रतीक्षालय मे काॅकरोचों, खटमलों, टूटी कुर्सियों, बेंचों, बदबूदार शौचालयों, मजबूरन रेलगाड़ी की छत पर बैठने वाले लोगों की बदहाली से रूबरू अवश्य होते। रेलमंत्री और प्रधानमंत्री के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के प्लेटफार्म व रेल सुविधा के दर्जन भर स्टेशनों का नवीनीकरण कर देने और बुलेट ट्रेन चला देने से क्या गरीब भारतीयों की दुर्दशा समाप्त हो जाएगी ?

कुछ महीने पूर्व भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने राजधानी एक्सप्रेस के प्रथम श्रेणी एसी मे यात्रा की। उनका कहना था कि प्लेटफार्म की गन्दगी बर्दाशत बाहर थी। ट्रेन इतनी ज़्यादा हिल रही थी कि आधी प्याली चाय बाहर गिर गई। ट्रेन के अन्दर भी गन्दगी थी। दो-तीन घण्टों की उनकी ट्रेन यात्रा काफी परेशानी का सबब रही। आम जनता के पैसे से चलने वाली भारतीय रेल व्यवस्था मे 90 प्रतिशत आम भारतीयों की उपेक्षा क्यों की जाती है यह समझ से बाहर है ।े क्या आम भारतीय यात्रियों को ऐसे ही अच्छे दिन की प्रतीक्षा थी ?




No comments:

Post a Comment