मैंने उन्हें हर जगह लड़ते देखा है।
मां की कोख में लिंग जांच होने पर कोख में ही गला घोट दिए जाने के डर से अपनी किस्मत से लड़ती हैं।
बचपन में अपने भाई को अधिक महत्व और लाड- प्यार मिलता देख भाई से लड़ती हैं।
जवानी की दहलीज़ पर पैर रखने के बाद घर से बाहर निकलती है तब गलियों में अशलील फब्तियां कसते और सैकड़ों घूरती निगाहों से लड़ती हैं।
सार्वजनिक स्थानो अथवा बस व आटो में सफर करते हुए सट कर बैठे मनचलों से लड़ती हैं।
बैंक, स्टेशन व अन्य स्थानों पर महिला लाईन में खड़े पुरुषों को हटाने व अपनी जगह बनाने के लिए लड़ती हैं।
आगे पढ़ने , अपना कैरियर बनाने व आत्म-निर्भर बनने के लिए अपने ही घर में अपनों से लड़ती हैं।
कार्य स्थल पर बराबरी के वेतन का अधिकार पाने और सुरक्षित वातावरण में कार्य करने हेतु अफसर व सहकर्मी से लड़ती हैं।
विवाह के पश्चात ससुराल में प्रेम अथवा आत्म स्वाभिमान के लिए अपने पति से लड़ती हैं।
कभी दुर्गा, पार्वती और झांसी की रानी बन के अत्याचार के खिलाफ लड़ती हैं, तो
कभी मलाला, शहाबानो और लक्षमी अग्रवाल बन के समाज के लिए लड़ती हैं।
सच में लड़कियां बहुत लड़ाका होती हैं।
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