हमारे देश में धन को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है। दीपावली पर लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है, जिससे कि लक्ष्मी जी कृपा सब पर बनी रहे और घर में धन व समृद्धि आए। पर क्या सच में धन लक्ष्मी का स्वरूप होता है?
इसमें कोई दो राय नहीं है कि समृद्धि के लिए धन की आवश्यकता होती है और उसी धन कमाने के लिए आज लोग किसी भी हद तक जा रहे हैं। आज व्यक्ति का सम्मान उसके बैंक बैलेंस के अनुसार तौला जाता है। जितना अमीर व्यक्ति, समाज में उतना सम्मानित स्थान। किसी को कोई फर्क नही पड़ता कि वह धन किस प्रकार एकत्रित किया गया है। हमारे देश के नेता- एम.एल.ए. हों, व्यापार जगत के बड़े-बड़े कारोबारी हों, सरकारी दफ्तरों में बैठे नौकरशाह हों सब अपना जेब भरने की जुगत में लगे हुए हैं। आम जनता की मेहनत कमाई प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इनके जेबों की शोभा बढ़ा रही है। जिससे केवल वे ही नहीं उनकी आने वाली कई पीढ़ियां ऐश करती हैं। आम जनता किसे दोषी ठहराए किससे शिकायत करें, आखिर हम ही ने उन नेताओं को अपना बहुमूल्य वोट देकर सत्ता में बिठाया है। हम ही तो हैं जो विदेशी उत्पादों का प्रयोग कर के उस पर चढ़ने वाले भारी आयात-कर भरते हैं। हम ही तो हैं जो सरकारी अफसरों को घूस दे कर अपना काम कराते हैं क्योंकि उसके बिना हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। फिर क्यो हम दूसरों को दोष देते हैं।
आज हम जिस समाज का हिस्सा है, यहां यदि हमारे बैंक में मोटी रकम न हो तो हम जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। आज घर केवल सिर छिपाने के लिए नहीं वरन् साज-सज्जा वह आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित होना चाहिए जिससे कि समाज धाक बनी रहे। मंहगे कपड़े, प्राइवेट स्कूलों वाली संस्थानों में पढ़ाई के नाम पर ली जाने वाली मंहगी फीस, तरह तरह की बीमारियों के पैदा होने से मंहगी होती चिकित्सा सुविधाएं, बढ़ती मंहगाई के चलते दिन-प्रतिदिन मंहगे होते खाद्य-पदार्थ इत्यादि। यह सब हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं।
अखबार वाले टीवी चैनलों में विलास वस्तुओं के विज्ञापन की होड़ सी लगी है जिसे खरीदना हमारे जीवन का परम लक्ष्य बनता जा रहा है। फिल्मी जगत के सितारे व विभिन्न क्षेत्रों की प्रसिद्ध हस्तियों को हम अपना मार्गदर्शक बनाते हैं और उनके जैसे आलीशान घर , चकाचौंध और विलासित से भरा जीवन जीने की कामना करते हैं। मंहगे कपड़े, जूते, बैग व गाड़ी में सफर करती महिला को शादी-ब्याह व पार्टी में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में देखा जाता है वहीं दूसरी ओर यह प्रतिष्ठता और सम्मान सूती साड़ी पहने एक स्कूल टीचर को नहीं मिलता। आज बड़े-बड़े कारोबारी जो अरबों-खरबों का मुनाफा कमा रहे हैं, उनकी वाह-वाही से हर अखबार और न्यूज़ चैनल भरे पड़े हैं। पर उस खबर को दिखाने और उसके पीछे यदि कोई घोटाला है तो उसका पर्दाफाश करने के लिए एक पत्रकार को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसका नाम तक कोई नहीं जानता। एक झोपड़ी में रहने वाला गरीब लाचार किसान जो अपनी रोजमर्रा की ज़रूरत पूरी करने वाले अपनी फसल को जोतने के लिए एक एक पैसे का मोहताज होता है। जो अपना गांव-शहर छोड़ कर किसी दूसरी जगह भागने का सोच भी नहीं सकता, उसे कोई बैंक लोन नहीं देता। वहीं एक नामी कारोबारी जिस पर पहले से ही करोड़ों का कर्ज़ चढ़ा है, उसे हर बैंक लोन देने को तैयार खड़ा रहता है। फिर वही कारोबारी देश का पैसा दूसरे देश ले कर भाग जाता है और ऐश की ज़िंदगी जीता है।
एक बात ध्यान देने वाली है कि धन को भले ही लक्ष्मी स्वरूप माना जाता रहा है पर जो धन छल - कपट, धोखे और घोटाले से एकत्रित किया जाए वह कभी लक्ष्मी नहीं कहलाएगा। इस प्रकार से कमाया गया धन कभी किसी के जीवन में सुख और समृद्धि नहीं ला सकता। चाहे वह अरबों-खरबों का गबन हो या चन्द रूपयों की हेरा-फेरी। इसी लिए काला धन जमा कर के रखने वाला व्यक्ति और गबन कर के देश छोड़ कर भागने वाला व्यक्ति कभी शान्ति से नहीं बैठ सकता। उसे हर समय इस बात का भय सताता रहता है कि कब कहां से उसे धर-दबोच लिया जाएगा।
लक्ष्मी वह धन होता है जो ईमानदारी और सच्चाई से कमाया जाए। चोरी, गबन और धांधली से धन तो कमाया जा सकता है पर वह धन कभी लक्ष्मी नहीं बन सकता। माता लक्ष्मी की प्रतिमा देखें तो वह एक कमल के फूल पर बैठी हैं और उनके दोनों हाथों में एक एक कमल है। कमल का फूल पवित्रता, शांति और आध्यात्मिक कल्याण का प्रतीक है। कीचड़ में खिला यह फूल इस बात को दर्शाता है कि कैसे गन्दे पानी में एक कोमल सा फूल पवित्रता और सुन्दरता की मिसाल बन कर खड़ा है। ठीक उसी प्रकार उस गन्दे पानी जैसी भ्रष्टाचारी दुनिया का हिस्सा बन कर भी हम सब को सच्चाई और ईमानदारी से जीवन जीने की राह चुन्नी चाहिए। ऐसा धन किस काम का जो सुख और शांति लाने के बजाय भय और असुरक्षा की भावना पैदा करें।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि समृद्धि के लिए धन की आवश्यकता होती है और उसी धन कमाने के लिए आज लोग किसी भी हद तक जा रहे हैं। आज व्यक्ति का सम्मान उसके बैंक बैलेंस के अनुसार तौला जाता है। जितना अमीर व्यक्ति, समाज में उतना सम्मानित स्थान। किसी को कोई फर्क नही पड़ता कि वह धन किस प्रकार एकत्रित किया गया है। हमारे देश के नेता- एम.एल.ए. हों, व्यापार जगत के बड़े-बड़े कारोबारी हों, सरकारी दफ्तरों में बैठे नौकरशाह हों सब अपना जेब भरने की जुगत में लगे हुए हैं। आम जनता की मेहनत कमाई प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इनके जेबों की शोभा बढ़ा रही है। जिससे केवल वे ही नहीं उनकी आने वाली कई पीढ़ियां ऐश करती हैं। आम जनता किसे दोषी ठहराए किससे शिकायत करें, आखिर हम ही ने उन नेताओं को अपना बहुमूल्य वोट देकर सत्ता में बिठाया है। हम ही तो हैं जो विदेशी उत्पादों का प्रयोग कर के उस पर चढ़ने वाले भारी आयात-कर भरते हैं। हम ही तो हैं जो सरकारी अफसरों को घूस दे कर अपना काम कराते हैं क्योंकि उसके बिना हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। फिर क्यो हम दूसरों को दोष देते हैं।
आज हम जिस समाज का हिस्सा है, यहां यदि हमारे बैंक में मोटी रकम न हो तो हम जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। आज घर केवल सिर छिपाने के लिए नहीं वरन् साज-सज्जा वह आधुनिक संसाधनों से सुसज्जित होना चाहिए जिससे कि समाज धाक बनी रहे। मंहगे कपड़े, प्राइवेट स्कूलों वाली संस्थानों में पढ़ाई के नाम पर ली जाने वाली मंहगी फीस, तरह तरह की बीमारियों के पैदा होने से मंहगी होती चिकित्सा सुविधाएं, बढ़ती मंहगाई के चलते दिन-प्रतिदिन मंहगे होते खाद्य-पदार्थ इत्यादि। यह सब हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं।
अखबार वाले टीवी चैनलों में विलास वस्तुओं के विज्ञापन की होड़ सी लगी है जिसे खरीदना हमारे जीवन का परम लक्ष्य बनता जा रहा है। फिल्मी जगत के सितारे व विभिन्न क्षेत्रों की प्रसिद्ध हस्तियों को हम अपना मार्गदर्शक बनाते हैं और उनके जैसे आलीशान घर , चकाचौंध और विलासित से भरा जीवन जीने की कामना करते हैं। मंहगे कपड़े, जूते, बैग व गाड़ी में सफर करती महिला को शादी-ब्याह व पार्टी में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में देखा जाता है वहीं दूसरी ओर यह प्रतिष्ठता और सम्मान सूती साड़ी पहने एक स्कूल टीचर को नहीं मिलता। आज बड़े-बड़े कारोबारी जो अरबों-खरबों का मुनाफा कमा रहे हैं, उनकी वाह-वाही से हर अखबार और न्यूज़ चैनल भरे पड़े हैं। पर उस खबर को दिखाने और उसके पीछे यदि कोई घोटाला है तो उसका पर्दाफाश करने के लिए एक पत्रकार को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसका नाम तक कोई नहीं जानता। एक झोपड़ी में रहने वाला गरीब लाचार किसान जो अपनी रोजमर्रा की ज़रूरत पूरी करने वाले अपनी फसल को जोतने के लिए एक एक पैसे का मोहताज होता है। जो अपना गांव-शहर छोड़ कर किसी दूसरी जगह भागने का सोच भी नहीं सकता, उसे कोई बैंक लोन नहीं देता। वहीं एक नामी कारोबारी जिस पर पहले से ही करोड़ों का कर्ज़ चढ़ा है, उसे हर बैंक लोन देने को तैयार खड़ा रहता है। फिर वही कारोबारी देश का पैसा दूसरे देश ले कर भाग जाता है और ऐश की ज़िंदगी जीता है।
एक बात ध्यान देने वाली है कि धन को भले ही लक्ष्मी स्वरूप माना जाता रहा है पर जो धन छल - कपट, धोखे और घोटाले से एकत्रित किया जाए वह कभी लक्ष्मी नहीं कहलाएगा। इस प्रकार से कमाया गया धन कभी किसी के जीवन में सुख और समृद्धि नहीं ला सकता। चाहे वह अरबों-खरबों का गबन हो या चन्द रूपयों की हेरा-फेरी। इसी लिए काला धन जमा कर के रखने वाला व्यक्ति और गबन कर के देश छोड़ कर भागने वाला व्यक्ति कभी शान्ति से नहीं बैठ सकता। उसे हर समय इस बात का भय सताता रहता है कि कब कहां से उसे धर-दबोच लिया जाएगा।
लक्ष्मी वह धन होता है जो ईमानदारी और सच्चाई से कमाया जाए। चोरी, गबन और धांधली से धन तो कमाया जा सकता है पर वह धन कभी लक्ष्मी नहीं बन सकता। माता लक्ष्मी की प्रतिमा देखें तो वह एक कमल के फूल पर बैठी हैं और उनके दोनों हाथों में एक एक कमल है। कमल का फूल पवित्रता, शांति और आध्यात्मिक कल्याण का प्रतीक है। कीचड़ में खिला यह फूल इस बात को दर्शाता है कि कैसे गन्दे पानी में एक कोमल सा फूल पवित्रता और सुन्दरता की मिसाल बन कर खड़ा है। ठीक उसी प्रकार उस गन्दे पानी जैसी भ्रष्टाचारी दुनिया का हिस्सा बन कर भी हम सब को सच्चाई और ईमानदारी से जीवन जीने की राह चुन्नी चाहिए। ऐसा धन किस काम का जो सुख और शांति लाने के बजाय भय और असुरक्षा की भावना पैदा करें।
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